महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ वनसे घिरी हुई भाँति-भाँतिकी रमणीय पुष्करिणियाँ और सुरम्य एवं विशाल बहुसंख्यक तड़ाग बड़े सुन्दर जान पड़ते थे ॥ ४८ ॥ (चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णं मान्यैः शिल्पिभिरावृतम् । उपयोगसमर्थैश्च सर्वद्रव्यैः समावृतम् ॥ नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम् । मत्तवारणसम्पूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः ॥ सर्वदाभिगतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा । तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥ पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा । पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ कृतमङ्गलसत्कारो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्यानुमते स्थितः ॥ भ्रातृभिः सहितो राजन् केशवेन सहाभिभूः । तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्वारसंयुतम् ॥ वर्धमानपुरद्वारं प्रविवेश महाद्युतिः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम् ॥ जयेति ब्राह्मणगिरः श्रूयन्ते च सहस्रशः । संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च । कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ प्रविश्य भवनं राजा सत्कारैरभिपूजितः । पूजयामास विप्रेन्द्रान् केशवेन यथाक्रमम् ॥ ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम् । गोधनैश्च समाकीर्णं सस्यवृद्धिस्तदाभवत् ॥) वह नगर चारों वर्णोंके लोगोंसे ठसाठस भरा था। माननीय शिल्पी वहाँ निवास करते थे। वह पुरी उपभोगमें आनेवाली समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न थी। वहाँ सदा श्रेष्ठ पुरुष रहा करते थे। असंख्य नर-नारी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ मतवाले हाथी, ऊँट, गायें, बैल, गदहे और बकरे आदि पशु भी सदा मौजूद रहते थे। विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई उस पुरीमें सदा साधु-महात्माओंका समागम होता था। वह इन्द्रप्रस्थ नगर स्वर्गके समान शोभा पाता था। राजन्! कौरवराज महातेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा मंगल-कृत्य कराकर द्वैपायन व्यासको आगे करके धौम्य मुनिकी सम्मतिके अनुसार भाइयों तथा भगवान् श्रीकृष्णके साथ बत्तीस दरवाजोंसे युक्त तोरणद्वारके सामने आकर वर्धमान नामक नगरद्वारमें प्रवेश किया। उस समय शंख और नगारोंकी आवाज बड़े