महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1442, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंजोर-जोरसे सुनायी देती थी। सहस्रों ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए जयघोषका श्रवण होता था। मुनि तथा सूत, मागध और बन्दीजन राजाकी स्तुति कर रहे थे। राजा युधिष्ठिर हाथीपर बैठे हुए थे। उन्होंने राजमार्गको पार करके एक उत्तम भवनमें प्रवेश किया, जहाँ मांगलिक कृत्य सम्पन्न किया गया था। उस भवनमें प्रवेश करके भाँति-भाँतिके सत्कारोंसे सम्मानित हो राजा युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रमशः सभी शेष ब्राह्मणोंका पूजन किया। तदनन्तर अगणित नर-नारियोंसे सुशोभित वह राष्ट्र और नगर गोधनसे सम्पन्न हो गया और दिनोंदिन खेतीकी वृद्धि होने लगी। तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत् । पाण्डवानां महाराज शश्वत् प्रीतिरवर्धत ॥ ४९ ॥ महाराज ! पुण्यात्मा मनुष्योंसे भरे हुए उस महान् राष्ट्रमें प्रवेश करनेके बाद पाण्डवोंकी प्रसन्नता निरन्तर बढ़ती गयी ॥ ४९ ॥ तत्र भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयने कृते । पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः ॥ ५० ॥ भीष्म तथा राजा धृतराष्ट्रके द्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको आधा राज्य देकर वहाँसे विदा कर देनेपर समस्त पाण्डव खाण्डवप्रस्थके निवासी हो गये ॥ ५० ॥ पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समन्वितम् । शुशुभे तत् पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥ ५१ ॥ इन्द्रके समान शक्तिशाली और महान् धनुर्धर पाँचों पाण्डवोंके द्वारा वह श्रेष्ठ इन्द्रप्रस्थ नगर नागोंसे युक्त भोगवतीपुरीकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ५१ ॥ (ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च । द्वैपायनं च सम्पूज्य विसृज्य च नराधिप । वार्ष्णेयमब्रवीद् राजा गन्तुकामं कृतक्षणम् ॥ तदनन्तर विश्वकर्माका पूजन करके राजाने उन्हें विदा कर दिया। फिर व्यासजीको सम्मानपूर्वक विदा देकर राजा युधिष्ठिरने जानेके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्णसे कहा।
युधिष्ठिर उवाच
तव प्रसादाद् वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयानघ । प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम् ॥ तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च महामते । गतिस्त्वमन्तकाले च पाण्डवानां तु माधव ॥ मातास्माकं पिता देवो न पाण्डुं विद्म वै वयम् । ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान् हि नः । यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयानघ ॥