महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1443, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर बोले—निष्पाप वृष्णिनन्दन! आपकी ही कृपासे मैंने राज्य प्राप्त किया है। वीर! आपके ही प्रसादसे यह अत्यन्त दुर्गम एवं निर्जन प्रदेश आज धन-धान्यसे सम्पन्न राष्ट्र बन गया। महामते! आपकी ही दयासे हमलोग राज्यसिंहासनपर आसीन हुए हैं। माधव! अन्तकालमें भी आप ही हम पाण्डवोंकी गति हैं। आप ही हमारे माता-पिता और इष्टदेव हैं। हम पाण्डुको नहीं जानते। अनघ! आप स्वयं समझकर जो करनेयोग्य कार्य हो, वह हमसे करायें। पाण्डवोंके लिये जो अभीष्ट हो, उसी कार्यको करनेके लिये आप हमें अनुमति दें।
श्रीवासुदेव उवाच
त्वत्प्रभावान्महाभाग राज्यं प्राप्तं स्वधर्मतः ।
पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात् तव प्रभो ॥
धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान् ।
यथेष्टं पालय महीं सदा धर्मधुरं वह ॥
धर्मोपदेशं संक्षेपाद् ब्राह्मणान् भज कौरव ।
अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः ।
आदृत्य तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग! आपको अपने ही प्रभावसे अपने ही धर्मके फलस्वरूप राज्य प्राप्त हुआ है। प्रभो! जो राज्य आपके बाप-दादोंका ही है, वह आपको कैसे नहीं मिलता। धृतराष्ट्रके पुत्र दुराचारी हैं। वे पाण्डवोंका क्या कर लेंगे? आप इच्छानुसार पृथ्वीका पालन कीजिये और सदा धर्ममर्यादाकी धुरी धारण करिये। कुरुनन्दन! संक्षेपमें आपके लिये धर्मका उपदेश इतना ही है कि ब्राह्मणोंकी सेवा करिये। आज ही बड़ी जल्दीमें आपके यहाँ श्रीनारदजी पधारेंगे, उनका आदर-सत्कार करके उनकी बातें सुनिये और उनकी आज्ञाका पालन कीजिये।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोऽस्तु ते ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण कुन्तीदेवीके पास गये और उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणीमें बोले—'बुआजी! नमस्कार। अब मैं जाऊँगा (आज्ञा दीजिये)।'
कुन्त्युवाच
जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं च केशव ।
आर्येण चापि न ज्ञातं कुन्तिभोजेन चानघ ॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम् ।