महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः ॥
सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम ।
स्मरस्वैनान् महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः ॥
**कुन्ती बोली—**केशव! लाक्षागृहमें जाकर मैंने जो कष्ट भोगा है, उसे मेरे पूज्य पिता कुन्तिभोज भी नहीं जान सके हैं। गोविन्द! तुम्हारी सहायतासे ही मैं इस महान् दुःख-समुद्रसे पार हुई हूँ। प्रभो! तुम अनाथोंके, विशेषतः दीन-दुःखियोंके नाथ (रक्षक) हो। तुम्हारे दर्शनसे हमारे सारे दुःख दूर हो जाते हैं। महामते! इन पाण्डवोंको सदा याद रखना। ये तुम्हारे शुभ चिन्तनसे ही जीवन धारण करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम् ।
गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीसे यह कहकर कि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा, प्रणाम करके, विदा ले सेवकोंसहित वहाँसे जानेका विचार किया।
तां निवेश्य ततो वीरो रामेण सह केशवः ।
ययौ द्वारवतीं राजन् पाण्डवानुमते तदा ॥ ५२ ॥
राजन्! इस प्रकार उस पुरीको बसाकर बलरामजीके साथ वीरवर श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी अनुमति ले उस समय द्वारकापुरीको चले गये ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि पुरनिर्माणे षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें नगरनिर्माणविषयक दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९९ श्लोक मिलाकर कुल १५१ श्लोक हैं)