महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजितारयो महाप्रज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः ।
मुदं परमिकां प्राप्तास्तत्रोषुः पाण्डुनन्दनाः ॥ ७ ॥
वे सभी शत्रुओंपर विजय पा चुके थे, सभी महाबुद्धिमान् थे। सबने सत्यधर्मका आश्रय ले रखा था। इस प्रकार वे पाण्डव वहाँ बड़े आनन्दके साथ रहते थे ॥ ७ ॥
कुर्वाणाः पौरकार्याणि सर्वाणि पुरुषर्षभाः ।
आसांचक्रुर्महार्हेषु पार्थिवेष्वासनेषु च ॥ ८ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव नगरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य करते हुए बहुमूल्य तथा राजोचित सिंहासनोंपर बैठा करते थे ॥ ८ ॥
अथ तेषूपविष्टेषु सर्वेष्वेव महात्मसु ।
नारदस्त्वथ देवर्षिराजगाम यदृच्छया ॥ ९ ॥
एक दिन जब वे सभी महामना पाण्डव अपने सिंहासनोंपर विराजमान थे, उसी समय देवर्षि नारद अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे ॥ ९ ॥
(पथा नक्षत्रजुष्टेन सुपर्णचरितेन च ॥
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन सेवितेन महर्षिभिः ।
नभःस्थलेन दिव्येन दुर्लभेनातपस्विनाम् ॥
उनका आगमन आकाशमार्गसे हुआ, जिसका नक्षत्र सेवन करते हैं, जिसपर गरुड़ चलते हैं, जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश फैलता है और जो महर्षियोंसे सेवित है। जो लोग तपस्वी नहीं हैं, उनके लिये व्योममण्डलका वह दिव्य मार्ग दुर्लभ है।
भूतार्चितो भूतधरं राष्ट्रं नगरभूषितम् ।
अवेक्षमाणो द्युतिमानाजगाम महातपाः ॥
सर्ववेदान्तगो विप्रः सर्वविद्यासु पारगः ।
परेण तपसा युक्तो ब्राह्मेण तपसा वृतः ॥
नये नीतौ च निरतो विश्रुतश्च महामुनिः ।
सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा पूजित महान् तपस्वी एवं तेजस्वी देवर्षि नारद बड़े-बड़े नगरोंसे विभूषित और सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रयभूत राष्ट्रोंका अवलोकन करते हुए वहाँ आये। विप्रवर नारद सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रके ज्ञाता तथा समस्त विद्याओंके पारंगत पण्डित हैं। वे परमतपस्वी तथा ब्राह्मतेजसे सम्पन्न हैं; न्यायोचित बर्ताव तथा नीतिमें निरन्तर निरत रहनेवाले सुविख्यात महामुनि हैं।
परात् परतरं प्राप्तो धर्मात् समभिजग्मिवान् ॥
भावितात्मा गतरजाः शान्तो मृदुर्ऋजुर्द्विजः ।
धर्मेणाधिगतः सर्वैर्देवदानवमानुषैः ॥
अक्षीणवृत्तधर्मश्च संसारभयवर्जितः ।
सर्वथा कृतमर्यादो वेदेषु विविधेषु च ॥