भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1448

योग्य सभी अर्थोंका ज्ञान है। वे सबमें समभाव रखनेवाले हैं और वेदविषयक सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करनेवाले हैं। अर्थकी व्याख्याके समय सदा संशयोंका उच्छेद करते हैं। उनके हृदयमें संशयका लेश भी नहीं है। वे स्वभावतः धर्मनिपुण तथा नाना धर्मोंके विशेषज्ञ हैं। लोप, आगमधर्म तथा वृत्तिसंक्रमणके द्वारा प्रयोगमें आये हुए एक शब्दके अनेक अर्थोंको, पृथक्-पृथक् श्रवणगोचर होनेवाले अनेक शब्दोंके एक अर्थको तथा विभिन्न शब्दोंके भिन्न-भिन्न अर्थोंको वे पूर्णरूपसे देखते और समझते हैं।

प्रमाणभूतो लोकस्य सर्वाधिकरणेषु च ।
सर्ववर्णविकारेषु नित्यं सकलपूजितः ॥
स्वरेऽस्वरे च विविधे वृत्तेषु विविधेषु च ।
समस्थानेषु सर्वेषु समाम्नायेषु धातुषु ॥
उद्देश्यानां समाख्याता सर्वमाख्यातमुद्दिशन् ।
अभिसंधिषु तत्त्वज्ञः पदान्यङ्गान्यनुस्मरन् ॥
कालधर्मेण निर्दिष्टं यथार्थं च विचारयन् ।
चिकीर्षितं च यो वेत्ता यथा लोकेन संवृतम् ॥
विभाषितं च समयं भाषितं हृदयङ्गमम् ।
आत्मने च परस्मै च स्वरसंस्कारयोगवान् ॥
एषां स्वराणां वेत्ता च बोद्धा च वचनस्वरान् ।
विज्ञाता चोक्तवाक्यानामेकतां बहुतां तथा ॥
बोद्धा हि परमार्थंश्च विविधांश्च व्यतिक्रमान् ।
अभेदतश्च बहुशो बहुशश्चापि भेदतः ॥
वचनानां च विविधानादेशांश्च समीक्षिता ।
नानार्थकुशलस्तत्र तद्धितेषु च सर्वशः ॥
परिभूषयिता वाचां वर्णतः स्वरतोऽर्थतः ।
प्रत्ययांश्च समाख्याता नियतं प्रतिधातुकम् ॥
पञ्च चाक्षरजातानि स्वरसंज्ञानि यानि च ।)

सभी अधिकरणों और समस्त वर्णोंके विकारोंमें निर्णय देनेके निमित्त वे सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत हैं। सदा सब लोग उनकी पूजा करते हैं। नाना प्रकारके स्वर, व्यंजन, भाँति-भाँतिके छन्द, समान स्थानवाले सभी वर्ण, समाम्नाय तथा धातु—इन सबके उद्देश्योंकी नारदजी बहुत अच्छी व्याख्या करते हैं। सम्पूर्ण आख्यात प्रकरण (धातुरूप तिङन्त आदि)-का प्रतिपादन कर सकते हैं। सब प्रकारकी संधियोंके सम्पूर्ण रहस्योंको जानते हैं। पदों और अंगोंका निरन्तर स्मरण रखते हैं, काल-धर्मसे निर्दिष्ट यथार्थ तत्त्वका विचार करनेवाले हैं तथा वे लोगोंके छिपे हुए मनोभावको—वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी अच्छी तरह जानते हैं। विभाषित (वैकल्पिक), भाषित (निश्चयपूर्वक कथित)