महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः। युवयोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीयते॥ २२॥ हम तीनों लोकोंके ईश्वर होंगे, ऐसा संकल्प करके जो तुमलोगोंने यह बड़ी भारी तपस्या प्रारम्भ की थी, इसीलिये तुमलोगोंको अमर नहीं बनाया जाता; क्योंकि अमरत्व तुम्हारी तपस्याका उद्देश्य नहीं था॥ २२॥ त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भ्यामास्थितं तपः। हेतुनानेन दैत्येन्द्रौ न वा कामं करोम्यहम्॥ २३॥ दैत्यपतियो! तुम दोनोंने त्रिलोकीपर विजय पानेके लिये ही इस तपस्याका आश्रय लिया था, इसीलिये तुम्हारी अमरत्वविषयक कामनाकी पूर्ति मैं नहीं कर रहा हूँ॥ २३॥
सुन्दोपसुन्दावूचतुः त्रिषु लोकेषु यद् भूतं किंचित् स्थावरजङ्गमम्। सर्वस्मान्नो भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह॥ २४॥ सुन्द और उपसुन्द बोले—पितामह! तब यह वर दीजिये कि हम दोनोंमेंसे एक-दूसरेको छोड़कर तीनों लोकोंमें जो कोई भी चर या अचर भूत हैं, उनसे हमें मृत्युका भय न हो॥ २४॥ पितामह उवाच यत् प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद् ददानि वाम्।