भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1457

मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद् वा भविष्यति ॥ २५ ॥ ब्रह्माजीने कहा— तुमने जैसी प्रार्थना की है, तुम्हारी वह मुँहमाँगी वस्तु तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम्हारी मृत्युका विधान ठीक इसी प्रकार होगा ॥ २५ ॥

नारद उवाच

ततः पितामहो दत्त्वा वरमेतत् तदा तयोः । निवर्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २६ ॥ नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय उन दोनों दैत्योंको यह वरदान देकर और उन्हें तपस्यासे निवृत्त करके ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २६ ॥

लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तौ भ्रातरावुभौ । अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ ॥ २७ ॥ फिर वे दोनों भाई दैत्यराज सुन्द और उपसुन्द यह अभीष्ट वर पाकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये अवध्य हो पुनः अपने घरको ही लौट गये ॥ २७ ॥

तौ तु लब्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामौ मनस्विनौ । सर्वः सुहृज्जनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजग्मिवान् ॥ २८ ॥ वरदान पाकर पूर्णकाम होकर लौटे हुए उनदोनों मनस्वी वीरोंको देखकर उनके सभी सगे-सम्बन्धी बड़े प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥

ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ सम्बभूवतुः । महार्हाभरणोपेतौ विरजोऽम्बरधारिणौ ॥ २९ ॥ अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम् । नित्यप्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृज्जनः ॥ ३० ॥ तदनन्तर उन्होंने जटाएँ कटाकर मस्तकपर मुकुट धारण कर लिये और बहुमूल्य आभूषण तथा निर्मल वस्त्र धारण करके ऐसा प्रकाश फैलाया, मानो असमयमें ही चाँदनी छिटक गयी हो और सर्वदा दिन-रात एकरस रहने लगी हो। उनके सभी सगे-सम्बन्धी सदा आमोद-प्रमोदमें डूबे रहते थे ॥ २९-३० ॥

भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति । गीयतां पीयतां चेति शब्दश्चासीद् गृहे गृहे ॥ ३१ ॥ प्रत्येक घरमें सर्वदा 'खाओ, भोग करो, लुटाओ, मौज करो, गाओ और पीओ' का शब्द गूँजता रहता था ॥ ३१ ॥

तत्र तत्र महानादैरूत्कृष्टतलनादितैः । हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत् पुरम् ॥ ३२ ॥ जहाँ-तहाँ जोर-जोरसे तालियाँ पीटनेकी ऊँची आवाजसे दैत्योंका वह सारा नगर हर्ष और आनन्दमें मग्न जान पड़ता था ॥ ३२ ॥

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