महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1539, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! प्रतिदिन उनके मनमें यज्ञ और दानके सिवा दूसरा कोई विचार ही नहीं उठता था। वे यज्ञकर्मोंके आरम्भ और नाना प्रकारके दानोंमें ही लगे रहते थे ॥ १९ ॥ ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवमीजे स भूमिपः । ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥ २० ॥ इस प्रकार वे बुद्धिमान् नरेश ऋत्विजोंके साथ यज्ञ किया करते थे। यज्ञ करते-करते उनके ऋत्विजोंकी आँखें धुएँसे व्याकुल हो उठीं ॥ २० ॥ कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्ते नराधिपम् । ततः प्रचोदयामास ऋत्विजस्तान् महीपतिः ॥ २१ ॥ चक्षुर्विकलतां प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् । ततस्तेषामनुमते तद् विप्रैस्तु नराधिपः ॥ २२ ॥ सत्रं समापयामास ऋत्विग्भिरपरैः सह । दीर्घकालतक आहुति देते-देते वे सभी खिन्न हो गये थे। इसलिये राजाको छोड़कर चले गये। तब राजाने उन ऋत्विजोंको पुनः यज्ञके लिये प्रेरित किया। परंतु जिनके नेत्र दुखने लगे थे, वे ऋत्विज उनके यज्ञमें नहीं आये। तब राजाने उनकी अनुमति लेकर दूसरे ब्राह्मणोंको ऋत्विज बनाया और उन्हींके साथ अपने चालू किये हुए यज्ञको पूरा किया ॥ २१-२२ १/२ ॥ तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् कालपर्यये ॥ २३ ॥ सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल । ऋत्विजो नाभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥ २४ ॥ इस प्रकार यज्ञपरायण राजाके मनमें किसी समय यह संकल्प उठा कि मैं सौ वर्षोंतक चालू रहनेवाला एक सत्र प्रारम्भ करूँ; परंतु उन महामनाको वह यज्ञ आरम्भ करनेके लिये ऋत्विज ही नहीं मिले ॥ २३-२४ ॥ स च राजाकरोद् यत्नं महान्तं ससुहृज्जनः । प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशाः ॥ २५ ॥ ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः । ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः ॥ २६ ॥ उन महायशस्वी नरेशने अपने सुहृदोंको साथ लेकर इस कार्यके लिये बहुत बड़ा प्रयत्न किया। पैरोंपर पड़कर, सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और इच्छानुसार दान देकर बार-बार निरालस्यभावसे ऋत्विजोंको मनाया, उनसे यज्ञ करानेके लिये अनुनय-विनय की; परंतु उन्होंने अमिततेजस्वी नरेशके मनोरथको सफल नहीं किया ॥ २५-२६ ॥ स चाश्रमस्थान् राजर्षिस्तानुवाच रुषान्वितः । यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूषायां न च स्थितः ॥ २७ ॥ आशु त्याज्योऽस्मि युष्माभिर्ब्राह्मणैश्च जुगुप्सितः ।