भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1538

रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्त्वसमायुतम् ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! भगवान् अग्निदेव देवराज इन्द्रके द्वारा सुरक्षित और अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए खाण्डववनको किसलिये जलाना चाहते थे? ॥ १२ ॥
न ह्येतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं सम्प्रतिभाति मे ।
यद् ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥ १३ ॥
विप्रवर! मुझे इसका कोई साधारण कारण नहीं जान पड़ता, जिसके लिये कुपित होकर हव्यवाहन अग्निने समूचे खाण्डववनको भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
एतद् विस्तरशो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥ १४ ॥
ब्रह्मन्! मुने! पूर्वकालमें खाण्डववनका दाह जिस प्रकार हुआ, वह सब विस्तारके साथ मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु मे ब्रुवतो राजन् सर्वमेतद् यथातथम् ।
यन्निमित्तं ददाहाग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज जनमेजय! अग्निदेवने जिस कारण खाण्डववनको जलाया, वह सब वृत्तान्त मैं यथावत् बतलाता हूँ, सुनो ॥ १५ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृषिसंस्तुताम् ।
कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! खाण्डववनके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्राचीन कथा महर्षियोंद्वारा प्रस्तुत की गयी है। उसीको मैं तुमसे कहूँगा ॥ १६ ॥
पौराणः श्रूयते राजन् राजा हरिहयोपमः ।
श्वेतकिर्नाम विख्यातों बलविक्रमसंयुतः ॥ १७ ॥
राजन्! सुना जाता है, प्राचीनकालमें इन्द्रके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्वेतकि नामके एक राजा थे ॥ १७ ॥
यज्वा दानपतिर्धीमान् यथा नान्योऽस्ति कश्चन ।
ईजे च स महायज्ञैः ऋतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥ १८ ॥
उस समय उनके-जैसा यज्ञ करनेवाला, दाता और बुद्धिमान् दूसरा कोई नहीं था। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १८ ॥
तस्य नान्याभवद् बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप ।
सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेषु च ॥ १९ ॥