भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1537

**ब्राह्मणदेवताने कहा—**वीरो! मुझे अन्नकी भूख नहीं है, आपलोग मुझे अग्नि समझें। जो अन्न मेरे अनुरूप हो, वही आप दोनों मुझे दें ।। ५ ।।
इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति ।
न च शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ।। ६ ।।
इन्द्र सदा इस खाण्डववनकी रक्षा करते हैं। उन महामनासे सुरक्षित होनेके कारण मैं इसे जला नहीं पाता ।। ६ ।।
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा ।
सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ।। ७ ।।
इस वनमें इन्द्रका सखा तक्षक नाग अपने परिवारसहित सदा निवास करता है। उसीके लिये वज्रधारी इन्द्र सदा इसकी रक्षा करते हैं ।। ७ ।।
तत्र भूतान्यनेकानि रक्षतेऽस्य प्रसङ्गतः ।
तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ।। ८ ।।
उस तक्षक नागके प्रसंगसे ही यहाँ रहनेवाले और भी अनेक जीवोंकी वे रक्षा करते हैं, इसलिये इन्द्रके प्रभावसे मैं इस वनको जला नहीं पाता। परंतु मैं सदा ही इसे जलानेकी इच्छा रखता हूँ ।। ८ ।।
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति ।
ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ।। ९ ।।
मुझे प्रज्वलित देखकर वे मेघोंद्वारा जलकी वर्षा करने लगते हैं, यही कारण है कि जलानेकी इच्छा रखते हुए भी मैं इस खाण्डववनको दग्ध करनेमें सफल नहीं हो पाता ।। ९ ।।
स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः ।
दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया ।। १० ।।
आप दोनों अस्त्रविद्याके पूरे जानकार हैं, अतः मैं इसी उद्देश्यसे आपके पास आया हूँ कि आप दोनोंकी सहायतासे इस खाण्डववनको जला सकूँ। मैं इसी अन्नकी भिक्षा माँगता हूँ ।। १० ।।
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः ।
उत्तमास्त्रविदौ सम्यक् सर्वतो वारयिष्यथः ।। ११ ।।
आप दोनों उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः जब मैं इस वनको जलाने लगूँ, उस समय आपलोग ऊपरसे बरसती हुई जलकी धाराओं तथा इस वनसे निकलकर चारों ओर भागनेवाले प्राणियोंको रोकियेगा ।। ११ ।।

जनमेजय उवाच

किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति ।