महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
**ब्राह्मणदेवताने कहा—**वीरो! मुझे अन्नकी भूख नहीं है, आपलोग मुझे अग्नि समझें। जो अन्न मेरे अनुरूप हो, वही आप दोनों मुझे दें ।। ५ ।।
इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति ।
न च शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ।। ६ ।।
इन्द्र सदा इस खाण्डववनकी रक्षा करते हैं। उन महामनासे सुरक्षित होनेके कारण मैं इसे जला नहीं पाता ।। ६ ।।
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा ।
सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ।। ७ ।।
इस वनमें इन्द्रका सखा तक्षक नाग अपने परिवारसहित सदा निवास करता है। उसीके लिये वज्रधारी इन्द्र सदा इसकी रक्षा करते हैं ।। ७ ।।
तत्र भूतान्यनेकानि रक्षतेऽस्य प्रसङ्गतः ।
तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ।। ८ ।।
उस तक्षक नागके प्रसंगसे ही यहाँ रहनेवाले और भी अनेक जीवोंकी वे रक्षा करते हैं, इसलिये इन्द्रके प्रभावसे मैं इस वनको जला नहीं पाता। परंतु मैं सदा ही इसे जलानेकी इच्छा रखता हूँ ।। ८ ।।
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति ।
ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ।। ९ ।।
मुझे प्रज्वलित देखकर वे मेघोंद्वारा जलकी वर्षा करने लगते हैं, यही कारण है कि जलानेकी इच्छा रखते हुए भी मैं इस खाण्डववनको दग्ध करनेमें सफल नहीं हो पाता ।। ९ ।।
स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः ।
दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया ।। १० ।।
आप दोनों अस्त्रविद्याके पूरे जानकार हैं, अतः मैं इसी उद्देश्यसे आपके पास आया हूँ कि आप दोनोंकी सहायतासे इस खाण्डववनको जला सकूँ। मैं इसी अन्नकी भिक्षा माँगता हूँ ।। १० ।।
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः ।
उत्तमास्त्रविदौ सम्यक् सर्वतो वारयिष्यथः ।। ११ ।।
आप दोनों उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः जब मैं इस वनको जलाने लगूँ, उस समय आपलोग ऊपरसे बरसती हुई जलकी धाराओं तथा इस वनसे निकलकर चारों ओर भागनेवाले प्राणियोंको रोकियेगा ।। ११ ।।
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति ।
रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्त्वसमायुतम् ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! भगवान् अग्निदेव देवराज इन्द्रके द्वारा सुरक्षित और अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए खाण्डववनको किसलिये जलाना चाहते थे? ॥ १२ ॥
न ह्येतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं सम्प्रतिभाति मे ।
यद् ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥ १३ ॥
विप्रवर! मुझे इसका कोई साधारण कारण नहीं जान पड़ता, जिसके लिये कुपित होकर हव्यवाहन अग्निने समूचे खाण्डववनको भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
एतद् विस्तरशो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥ १४ ॥
ब्रह्मन्! मुने! पूर्वकालमें खाण्डववनका दाह जिस प्रकार हुआ, वह सब विस्तारके साथ मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे ब्रुवतो राजन् सर्वमेतद् यथातथम् ।
यन्निमित्तं ददाहाग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज जनमेजय! अग्निदेवने जिस कारण खाण्डववनको जलाया, वह सब वृत्तान्त मैं यथावत् बतलाता हूँ, सुनो ॥ १५ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृषिसंस्तुताम् ।
कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! खाण्डववनके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्राचीन कथा महर्षियोंद्वारा प्रस्तुत की गयी है। उसीको मैं तुमसे कहूँगा ॥ १६ ॥
पौराणः श्रूयते राजन् राजा हरिहयोपमः ।
श्वेतकिर्नाम विख्यातों बलविक्रमसंयुतः ॥ १७ ॥
राजन्! सुना जाता है, प्राचीनकालमें इन्द्रके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्वेतकि नामके एक राजा थे ॥ १७ ॥
यज्वा दानपतिर्धीमान् यथा नान्योऽस्ति कश्चन ।
ईजे च स महायज्ञैः ऋतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥ १८ ॥
उस समय उनके-जैसा यज्ञ करनेवाला, दाता और बुद्धिमान् दूसरा कोई नहीं था। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १८ ॥
तस्य नान्याभवद् बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप ।
सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेषु च ॥ १९ ॥
राजन्! प्रतिदिन उनके मनमें यज्ञ और दानके सिवा दूसरा कोई विचार ही नहीं उठता था। वे यज्ञकर्मोंके आरम्भ और नाना प्रकारके दानोंमें ही लगे रहते थे ॥ १९ ॥ ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवमीजे स भूमिपः । ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥ २० ॥ इस प्रकार वे बुद्धिमान् नरेश ऋत्विजोंके साथ यज्ञ किया करते थे। यज्ञ करते-करते उनके ऋत्विजोंकी आँखें धुएँसे व्याकुल हो उठीं ॥ २० ॥ कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्ते नराधिपम् । ततः प्रचोदयामास ऋत्विजस्तान् महीपतिः ॥ २१ ॥ चक्षुर्विकलतां प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् । ततस्तेषामनुमते तद् विप्रैस्तु नराधिपः ॥ २२ ॥ सत्रं समापयामास ऋत्विग्भिरपरैः सह । दीर्घकालतक आहुति देते-देते वे सभी खिन्न हो गये थे। इसलिये राजाको छोड़कर चले गये। तब राजाने उन ऋत्विजोंको पुनः यज्ञके लिये प्रेरित किया। परंतु जिनके नेत्र दुखने लगे थे, वे ऋत्विज उनके यज्ञमें नहीं आये। तब राजाने उनकी अनुमति लेकर दूसरे ब्राह्मणोंको ऋत्विज बनाया और उन्हींके साथ अपने चालू किये हुए यज्ञको पूरा किया ॥ २१-२२ १/२ ॥ तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् कालपर्यये ॥ २३ ॥ सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल । ऋत्विजो नाभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥ २४ ॥ इस प्रकार यज्ञपरायण राजाके मनमें किसी समय यह संकल्प उठा कि मैं सौ वर्षोंतक चालू रहनेवाला एक सत्र प्रारम्भ करूँ; परंतु उन महामनाको वह यज्ञ आरम्भ करनेके लिये ऋत्विज ही नहीं मिले ॥ २३-२४ ॥ स च राजाकरोद् यत्नं महान्तं ससुहृज्जनः । प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशाः ॥ २५ ॥ ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः । ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः ॥ २६ ॥ उन महायशस्वी नरेशने अपने सुहृदोंको साथ लेकर इस कार्यके लिये बहुत बड़ा प्रयत्न किया। पैरोंपर पड़कर, सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और इच्छानुसार दान देकर बार-बार निरालस्यभावसे ऋत्विजोंको मनाया, उनसे यज्ञ करानेके लिये अनुनय-विनय की; परंतु उन्होंने अमिततेजस्वी नरेशके मनोरथको सफल नहीं किया ॥ २५-२६ ॥ स चाश्रमस्थान् राजर्षिस्तानुवाच रुषान्वितः । यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूषायां न च स्थितः ॥ २७ ॥ आशु त्याज्योऽस्मि युष्माभिर्ब्राह्मणैश्च जुगुप्सितः ।
तन्नार्हथ क्रतुश्रद्धां व्याघातयितुमद्य ताम् ॥ २८ ॥ तब उन राजर्षिने कुछ कुपित होकर आश्रमवासी महर्षियोंसे कहा—'ब्राह्मणो! यदि मैं पतित होऊँ और आपलोगोंकी शुश्रूषासे मुँह मोड़ता होऊँ तो निन्दित होनेके कारण आप सभी ब्राह्मणोंके द्वारा शीघ्र ही त्याग देनेयोग्य हूँ, अन्यथा नहीं; अतः यज्ञ करानेके लिये मेरी इस बढ़ी हुई श्रद्धामें आपलोगोंको बाधा नहीं डालनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमाः । प्रपन्न एव वो विप्राः प्रसादं कर्तुमर्हथ ॥ २९ ॥ 'विप्रवरो! इस प्रकार बिना किसी अपराधके मेरा परित्याग करना आपलोगोंके लिये कदापि उचित नहीं है। मैं आपकी शरणमें हूँ। आपलोग कृपापूर्वक मुझपर प्रसन्न होइये ॥ २९ ॥ सान्त्वदानादिभिर्वाक्यैस्तत्त्वतः कार्यवत्तया । प्रसादयित्वा वक्ष्यामि यन्नः कार्यं द्विजोत्तमाः ॥ ३० ॥ 'श्रेष्ठ द्विजगण! मैं कार्यार्थी होनेके कारण सान्त्वना देकर दान आदि देनेकी बात कहकर यथार्थ वचनोंद्वारा आपलोगोंको प्रसन्न करके आपकी सेवामें अपना कार्य निवेदन कर रहा हूँ ॥ ३० ॥ अथवाहं परित्यक्तो भवद्भिर्द्वेषकारणात् । ऋत्विजोऽन्यान् गमिष्यामि याजनार्थं द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥ 'द्विजोत्तमो! यदि आपलोगोंने द्वेषवश मुझे त्याग दिया तो मैं यह यज्ञ करानेके लिये दूसरे ऋत्विजोंके पास जाऊँगा' ॥ ३१ ॥ एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स पार्थिवः । यदा न शेकू राजानं याजनार्थं परंतप ॥ ३२ ॥ ततस्ते याजकाः क्रुद्धास्तमूचुर्नृपसत्तमम् । तव कर्माण्यजस्रं वै वर्तन्ते पार्थिवोत्तम ॥ ३३ ॥ इतना कहकर राजा चुप हो गये। परंतप जनमेजय! जब वे ऋत्विज राजाका यज्ञ करानेके लिये उद्यत न हो सके, तब वे रुष्ट होकर उन नृपश्रेष्ठसे बोले—'भूपालशिरोमणे! आपके यज्ञकर्म तो निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥ ततो वयं परिश्रान्ताः सततं कर्मवाहिनः । श्रमादस्मात् परिश्रान्तान् स त्वं नस्त्यक्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥ बुद्धिमोहं समास्थाय त्वरासम्भावितोऽनघ । गच्छ रुद्र सकाशं त्वं स हि त्वां याजयिष्यति ॥ ३५ ॥ 'अतः सदा कर्ममें लगे रहनेके कारण हमलोग थक गये हैं, पहलेके परिश्रमसे हमारा कष्ट बढ़ गया है। ऐसी दशामें बुद्धिमोहित होनेके कारण उतावले होकर आप चाहें तो
हमारा त्याग कर सकते हैं। निष्पाप नरेश! आप तो भगवान् रुद्रके ही समीप जाइये। अब वे ही आपका यज्ञ करायेंगे' ।। ३४-३५ ।।
साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वेतकिर्नृपः ।
कैलासं पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः ।। ३६ ।।
ब्राह्मणोंका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर राजा श्वेतकिको बड़ा क्रोध हुआ। वे कैलास पर्वतपर जाकर उग्र तपस्यामें लग गये ।। ३६ ।।
आराधयन् महादेवं नियतः संशितव्रतः ।
उपवासपरो राजन् दीर्घकालमतिष्ठत ।। ३७ ।।
राजन्! तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले राजा श्वेतकि मन-इन्द्रियोंके संयमपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हुए बहुत दिनोंतक निराहार खड़े रहे ।। ३७ ।।
कदाचिद् द्वादशे काले कदाचिदपि षोडशे ।
आहारमकरोद् राजा मूलानि च फलानि च ।। ३८ ।।
वे कभी बारहवें दिन और कभी सोलहवें दिन फल-मूलका आहार कर लेते थे ।। ३८ ।।
ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन् स्थाणुरिवाचलः ।
षण्मासानभवद् राजा श्वेतकिः सुसमाहितः ।। ३९ ।।
दोनों बाहें ऊपर उठाकर एकटक देखते हुए राजा श्वेतकि एकाग्रचित हो छः महीनोंतक ठूँठकी तरह अविचल भावसे खड़े रहे ।। ३९ ।।
तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत् तपः ।
शंकरः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ।। ४० ।।
भारत! उन नृपश्रेष्ठको इस प्रकार भारी तपस्या करते देख भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया ।। ४० ।।
उवाच चैनं भगवान् स्निग्धगम्भीरया गिरा ।
प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप ।। ४१ ।।
और स्नेहपूर्वक गम्भीर वाणीमें भगवान्ने उनसे कहा—'परंतप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ ।। ४१ ।।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्यामिततेजसः ।। ४२ ।।
प्रणिपत्य महात्मानं राजर्षिः प्रत्यभाषत ।
'भूपाल! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा चाहते हो, वैसा वर माँग लो।' अमिततेजस्वी रुद्रका यह वचन सुनकर राजर्षि श्वेतकिने परमात्मा शिवके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ।। ४२ १/२ ।।
यदि मे भगवान् प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ।। ४३ ।।
स्वयं मां देवदेवेश याजयस्व सुरेश्वर ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञा तेन प्रभाषितम् ॥ ४४ ॥
उवाच भगवान् प्रीतः स्मितपूर्वमिदं वचः ।
‘देवदेवेश! सुरेश्वर! यदि मेरे ऊपर आप सर्वलोक-वन्दित भगवान् प्रसन्न हुए हैं तो स्वयं चलकर मेरा यज्ञ करायें।' राजाकी कही हुई यह बात सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न होकर मुसकराते हुए बोले— ॥ ४३-४४ १/२ ॥
नास्माकमेष विषयो वर्तते याजनं प्रति ॥ ४५ ॥
त्वया च सुमहत् तप्तं तपो राजन् वरार्थिना ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां समयेन परंतप ॥ ४६ ॥
‘राजन्! यज्ञ कराना हमारा काम नहीं है; परंतु तुमने यही वर माँगनेके लिये भारी तपस्या की है, अतः परंतप नरेश! मैं एक शर्तपर तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा' ॥ ४५-४६ ॥
रुद्र उवाच
समा द्वादश राजेन्द्र ब्रह्मचारी समाहितः ।
सततं त्वाज्यधाराभिर्यदि तर्पयसेऽनलम् ॥ ४७ ॥
कामं प्रार्थयसे यं त्वं मत्तः प्राप्स्यसि तं नृप ।
**रुद्र बोले—**राजेन्द्र! यदि तुम एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षोंतक घृतकी निरन्तर अविच्छिन्न धाराद्वारा अग्निदेवको तृप्त करो तो मुझसे जिस कामनाके लिये प्रार्थना कर रहे हो, उसे पाओगे ॥ ४७ १/२ ॥
एवमुक्तश्च रुद्रेण श्वेतकिर्मनुजाधिपः ॥ ४८ ॥
तथा चकार तत् सर्वं यथोक्तं शूलपाणिना ।
पूर्णे तु द्वादशे वर्षे पुनरायान्महेश्वरः ॥ ४९ ॥
भगवान् रुद्रके ऐसा कहनेपर राजा श्वेतकिने शूलपाणि शिवकी आज्ञाके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् महेश्वर पुनः आये ॥ ४८-४९ ॥
दृष्ट्वैव च स राजानं शंकरो लोकभावनः ।
उवाच परमप्रीतः श्वेतकिं नृपसत्तमम् ॥ ५० ॥
सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर नृपश्रेष्ठ श्वेतकिको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— ॥ ५० ॥
तोषितोऽहं नृपश्रेष्ठ त्वयेहाद्येन कर्मणा ।
याजनं ब्राह्मणानां तु विधिदृष्टं परंतप ॥ ५१ ॥
‘भूपालशिरोमणे! तुमने इस वेदविहित कर्मके द्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट किया है, परंतु परंतप! शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करानेका अधिकार ब्राह्मणोंको ही है ॥ ५१ ॥
अतोऽहं त्वां स्वयं नाद्य याजयामि परंतप ।
ममांशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तमः ॥ ५२ ॥ 'अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। पृथ्वीपर मेरे ही अंशभूत एक महाभाग श्रेष्ठ द्विज हैं ॥ ५२ ॥
दुर्वासा इति विख्यातः स हि त्वां याजयिष्यति । मन्नियोगान्महातेजाः सम्भाराः सम्भ्रियन्तु ते ॥ ५३ ॥ 'वे दुर्वासा नामसे विख्यात हैं। महातेजस्वी दुर्वासा मेरी आज्ञासे तुम्हारा यज्ञ करायेंगे; तुम सामग्री जुटाओ' ॥ ५३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रेण समुदाहृतम् । स्वपुरं पुनरागम्य सम्भारान् पुनरार्जयत् ॥ ५४ ॥ भगवान् रुद्रका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा पुनः अपने नगरमें आये और यज्ञसामग्री जुटाने लगे ॥ ५४ ॥
ततः सम्भृतसम्भारो भूयो रुद्रमुपागमत् । सम्भृता मम सम्भाराः सर्वोपकरणानि च ॥ ५५ ॥ त्वत्प्रसादान्महादेव श्वो मे दीक्षा भवेदिति । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ५६ ॥ दुर्वाससं समाहूय रुद्रो वचनमब्रवीत् । एष राजा महाभागः श्वेतकिर्द्विजसत्तम ॥ ५७ ॥ एनं याजय विप्रेन्द्र मन्नियोगेन भूमिपम् । बाढमित्येव वचनं रुद्रं तृषिरुवाच ह ॥ ५८ ॥ तदनन्तर सामग्री जुटाकर वे पुनः भगवान् रुद्रके पास गये और बोले—'महादेव! आपकी कृपासे मेरी यज्ञसामग्री तथा अन्य सभी आवश्यक उपकरण जुट गये। अब कल मुझे यज्ञकी दीक्षा मिल जानी चाहिये।' महामना राजाका यह कथन सुनकर भगवान् रुद्रने दुर्वासाको बुलाया और कहा—'द्विजश्रेष्ठ! ये महाभाग राजा श्वेतकि हैं। विप्रेन्द्र! मेरी आज्ञासे तुम इन भूमिपालका यज्ञ कराओ।' यह सुनकर महर्षिने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ५५—५८ ॥
ततः सत्रं समभवत् तस्य राज्ञो महात्मनः । यथाविधि यथाकालं यथोक्तं बहुदक्षिणम् ॥ ५९ ॥ तदनन्तर यथासमय विधिपूर्वक उन महामना नरेशका यज्ञ आरम्भ हुआ। शास्त्रमें जैसा बताया गया है, उसी ढंगसे सब कार्य हुआ। उस यज्ञमें बहुत-सी दक्षिणा दी गयी ॥ ५९ ॥
तस्मिन् परिसमाप्ते तु राज्ञः सत्रे महात्मनः । दुर्वाससाभ्यनुज्ञाता विप्रतस्थुः स्म याजकाः ॥ ६० ॥ ये तत्र दीक्षिताः सर्वे सदस्याश्च महौजसः । सोऽपि राजन् महाभागः स्वपुरं प्राविशत् तदा ॥ ६१ ॥
पूज्यमानो महाभागैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । वन्दिभिः स्तूयमानश्च नागरैश्चाभिनन्दितः ॥ ६२ ॥ उन महामना नरेशका वह यज्ञ पूरा होनेपर उसमें जो महातेजस्वी सदस्य और ऋत्विज् दीक्षित हुए थे, वे सब दुर्वासाजीकी आज्ञा ले अपने-अपने स्थानको चले गये। राजन्! वे महान् सौभाग्यशाली नरेश भी वेदोंके पारंगत महाभाग ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उस समय अपनी राजधानीमें गये। उस समय वन्दीजनोंने उनका यश गाया और पुरवासियोंने अभिनन्दन किया ॥ ६०—६२ ॥
एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः । कालेन महता चापि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥ ६३ ॥ ऋत्विग्भिः सहितः सर्वैः सदस्यैश्च समन्वितः । तस्य सत्रे पपौ वह्निर्द्विर्दश वत्सरान् ॥ ६४ ॥ नृपश्रेष्ठ राजर्षि श्वेतकिका आचार-व्यवहार ऐसा ही था। वे दीर्घकालके पश्चात् अपने यज्ञके सम्पूर्ण सदस्यों तथा ऋत्विजोंसहित देवताओंसे प्रशंसित हो स्वर्गलोकमें गये। उनके यज्ञमें अग्निने लगातार बारह वर्षोंतक घृतपान किया था ॥ ६३-६४ ॥
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि । हविषा च ततो वह्निः परां तृप्तिमगच्छत ॥ ६५ ॥ उस अद्वितीय यज्ञमें निरन्तर घीकी अविच्छिन्न धाराओंसे अग्निदेवको बड़ी तृप्ति प्राप्त हुई ॥ ६५ ॥
न चैच्छत् पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् । पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत् प्रकाशते ॥ ६६ ॥ अब उन्हें फिर दूसरे किसीका हविष्य ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं रही। उनका रंग सफेद हो गया, कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होते थे ॥ ६६ ॥
ततो भगवतो वह्नेर्विकारः समजायत । तेजसा विप्रहीणश्च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥ ६७ ॥ तब भगवान् अग्निदेवके उदरमें विकार हो गया। वे तेजसे हीन हो ग्लानिको प्राप्त होने लगे ॥ ६७ ॥
स लक्षयित्वा चात्मानं तेजोहीनं हुताशनः । जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥ ६८ ॥ अपनेको तेजसे हीन देख अग्निदेव ब्रह्माजीके लोकपूजित पुण्यधाममें गये ॥ ६८ ॥
तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् । भगवन् परमा प्रीतिः कृत्वा मे श्वेतकेतुना ॥ ६९ ॥ वहाँ बैठे हुए ब्रह्माजीसे वे यह वचन बोले—'भगवन्! राजा श्वेतकिने अपने यज्ञमें मुझे परम संतुष्ट कर दिया ॥ ६९ ॥
अरुचिश्चाभवत् तीव्रा तां न शक्नोम्यपोहितुम् । तेजसा विप्रहीणोऽस्मि बलेन च जगत्पते ॥ ७० ॥ इच्छेयं त्वत्प्रसादेन स्वात्मनः प्रकृतिं स्थिराम् । ‘परंतु मुझे अत्यन्त अरुचि हो गयी है, जिसे मैं किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता। जगत्पते! उस अरुचिके कारण मैं तेज और बलसे हीन होता जा रहा हूँ। अतः मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपासे मैं स्वस्थ हो जाऊँ; मेरी स्वाभाविक स्थिति सुदृढ़ बनी रहे’ ॥ ७० १/२ ॥ एतच्छ्रुत्वा हुतवहाद् भगवान् सर्वलोककृत् ॥ ७१ ॥ हव्यवाहमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव । त्वया द्वादश वर्षाणि वसोर्धाराहुतं हविः ॥ ७२ ॥ उपयुक्तं महाभाग तेन त्वां ग्लानिराविशत् । तेजसा विप्रहीणत्वात् सहसा हव्यवाहन ॥ ७३ ॥ मा गमस्त्वं यथा वह्ने प्रकृतिस्थो भविष्यसि । अरुचिं नाशयिष्येऽहं समयं प्रतिपद्य ते ॥ ७४ ॥ अग्निदेवकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी हव्यवाहन अग्निसे हँसते हुए-से इस प्रकार बोले—‘महाभाग! तुमने बारह वर्षोंतक वसुधाराकी आहुतिके रूपमें प्राप्त हुई घृतधाराका उपभोग किया है। इसीलिये तुम्हें ग्लानि प्राप्त हुई है। हव्यवाहन! तेजसे हीन होनेके कारण तुम्हें सहसा अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये। वह्ने! तुम फिर पूर्ववत् स्वस्थ हो जाओगे। मैं समय पाकर तुम्हारी अरुचि नष्ट कर दूँगा ॥ ७१—७४ ॥ पुरा देवनियोगेन यत् त्वया भस्मसात् कृतम् । आलयं देवशत्रूणां सुघोरं खाण्डवं वनम् ॥ ७५ ॥ तत्र सर्वाणि सत्त्वानि निवसन्ति विभावसो । तेषां त्वं मेदसा तृप्तः प्रकृतिस्थो भविष्यसि ॥ ७६ ॥ ‘पूर्वकालमें देवताओंके आदेशसे तुमने दैत्योंके जिस अत्यन्त घोर निवासस्थान खाण्डववनको जलाया था, वहाँ इस समय सब प्रकारके जीव-जन्तु आकर निवास करते हैं। विभावसो! उन्हींके मेदसे तृप्त होकर तुम स्वस्थ हो सकोगे ॥ ७५-७६ ॥ गच्छ शीघ्रं प्रदग्धुं त्वं ततो मोक्ष्यसि किल्बिषात् । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं परमेष्ठिमुखाच्च्युतम् ॥ ७७ ॥ उत्तमं जवमास्थाय प्रदुद्राव हुताशनः । आगम्य खाण्डवं दावमुत्तमं वीर्यमास्थितः । सहसा प्राज्वलच्चाग्निः क्रुद्धो वायुसमीरितः ॥ ७८ ॥ ‘उस वनको जलानेके लिये तुम शीघ्र ही जाओ। तभी इस ग्लानिसे छुटकारा पा सकोगे।’ परमेष्ठी ब्रह्माजीके मुखसे निकली हुई यह बात सुनकर अग्निदेव बड़े वेगसे वहाँ
दौड़े गये। खाण्डववनमें पहुँचकर उत्तम बलका आश्रय ले वायुका सहारा पाकर कुपित अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे ।। ७७-७८ ।। प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः । परमं यत्नमातिष्ठन् पावकस्य प्रशान्तये ।। ७९ ।। खाण्डववनको जलते देख वहाँ रहनेवाले प्राणियोंने उस आगको बुझानेके लिये बड़ा यत्न किया ।। ७९ ।। करैस्तु करिणः शीघ्रं जलमादाय सत्वराः । सिषिचुः पावकं क्रुद्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ।। ८० ।। सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें हाथी अपनी सूँडोंमें जल लेकर शीघ्रतापूर्वक दौड़े आते और क्रोधपूर्वक उतावलीके साथ आगपर उस जलको उड़ेल दिया करते थे ।। ८० ।। बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसंततिम् । मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ।। ८१ ।। अनेक सिरवाले नाग भी क्रोधसे मूर्च्छित हो अपने मस्तकोंद्वारा अग्निके समीप शीघ्रतापूर्वक जलकी धारा बरसाने लगे ।। ८१ ।। तथैवान्यानि सत्त्वानि नानाप्रहरणोद्यमैः । विलयं पावकं शीघ्रम नयन् भरतर्षभ ।। ८२ ।। भरतश्रेष्ठ! इसी प्रकार दूसरे-दूसरे जीवोंने भी अनेक प्रकारके प्रहारों (धूल झोंकने आदि) तथा उद्यमों (जल छिड़कने आदि)-के द्वारा शीघ्रतापूर्वक उस आगको बुझा दिया ।। ८२ ।। अनेन तु प्रकारेण भूयो भूयश्च प्रज्वलन् । सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ।। ८३ ।। इस तरह खाण्डववनमें अग्निने बार-बार प्रज्वलित होकर सात बार उसे जलानेका प्रयास किया; परंतु प्रतिबार वहाँके निवासियोंने उन्हें बुझा दिया ।। ८३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।
२२३-
त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना
वैशम्पायन उवाच
स तु नैराश्यमापन्नः सदा ग्लानिसमन्वितः ।
पितामहमुपागच्छत् संक्रुद्धो हव्यवाहनः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपनी असफलतासे अग्निदेवको बड़ी निराशा हुई। वे सदा ग्लानिमें डूबे रहने लगे और कुपित हो पितामह ब्रह्माजीके पास गये ॥ १ ॥
तच्च सर्वं यथान्यायं ब्रह्मणे संन्यवेदयत् ।
उवाच चैनं भगवान् मुहूर्तं स विचिन्त्य तु ॥ २ ॥
वहाँ उन्होंने ब्रह्माजीसे सब बातें यथोचित रीतिसे कह सुनायीं। तब भगवान् ब्रह्माजी दो घड़ीतक विचार करके उनसे बोले— ॥ २ ॥
उपायः परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेऽनघ ।
कालं च कंचित् क्षमतां ततस्त्वं धक्ष्यसेऽनल ॥ ३ ॥
'अनघ! तुम जिस प्रकार खाण्डववनको जलाओगे, वह उपाय तो मुझे सूझ गया है; किंतु उसके लिये तुम्हें कुछ समयतक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अनल! इसके बाद तुम खाण्डववनको जला सकोगे ॥ ३ ॥
भविष्यतः सहायौ ते नरनारायणौ तदा ।
ताभ्यां त्वं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन ॥ ४ ॥
'हव्यवाहन! उस समय नर और नारायण तुम्हारे सहायक होंगे। उन दोनोंके साथ रहकर तुम उस वनको जला सकोगे' ॥ ४ ॥
एवमस्त्विति तं वह्निर्ब्रह्माणं प्रत्यभाषत ।
सम्भूतौ तौ विदित्वा तु नरनारायणावृषी ॥ ५ ॥
कालस्य महतो राजंस्तस्य वाक्यं स्वयम्भुवः ।
अनुस्मृत्य जगामाथ पुनरेव पितामहम् ॥ ६ ॥
तब अग्निने ब्रह्माजीसे कहा—'अच्छा, ऐसा ही सही।' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् नर-नारायण ऋषियोंके अवतीर्ण होनेकी बात जानकर अग्निदेवको ब्रह्माजीकी बातका स्मरण हुआ। राजन्! तब वे पुनः ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५-६ ॥
अब्रवीच्च तदा ब्रह्मा यथा त्वं धक्ष्यसेऽनल ।
खाण्डवं दावमद्यैव मिषतोऽस्य शचीपतेः ॥ ७ ॥
उस समय ब्रह्माजीने कहा—'अनल! अब जिस प्रकार तुम इन्द्रके देखते-देखते अभी खाण्डववन जला सकोगे, वह उपाय सुनो ।। ७ ।। नरनारायणौ यौ तौ पूर्वदेवौ विभावसो । सम्प्राप्तौ मानुषे लोके कार्यार्थं हि दिवौकसाम् ॥ ८ ॥ 'विभावसो! आदिदेव नर और नारायण मुनि इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए हैं ।। ८ ।। अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते । तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपतः ॥ ९ ॥ 'वहाँके लोग उन्हें अर्जुन और वासुदेवके नामसे जानते हैं। वे दोनों इस समय खाण्डववनके पास ही एक साथ बैठे हैं ।। ९ ।। तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च । ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशैरपि ॥ १० ॥ 'उन दोनोंसे तुम खाण्डववन जलानेके कार्यमें सहायताकी याचना करो। तब तुम इन्द्रादि देवताओंसे रक्षित होनेपर भी उस वनको जला सकोगे ।। १० ।। तौ तु सत्त्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः । देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः ॥ ११ ॥ 'वे दोनों वीर एक साथ होनेपर यत्नपूर्वक वनके सारे जीवोंको भी रोकेंगे और देवराज इन्द्रका भी सामना करेंगे, मुझे इसमें कोई संशय नहीं है' ।। ११ ।। एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः । कृष्णपार्थवुपागम्य यमर्थं त्वभ्यभाषत ॥ १२ ॥ तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम । तच्छ्रुत्वा वचनं त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम् ॥ १३ ॥ अब्रवीन्नृपशार्दूल तत्कालसदृशं वचः । दिधक्षुं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः ॥ १४ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही ।। १२—१४ ।।
अर्जुन उवाच
उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च । यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्रधरान् बहून् ॥ १५ ॥
**अर्जुन बोले—**भगवन्! मेरे पास बहुत-से दिव्य एवं उत्तम अस्त्र तो हैं, जिनके द्वारा मैं एक क्या, अनेक वज्रधारियोंसे युद्ध कर सकता हूँ ।। १५ ।। धनुर्मे नास्ति भगवन् बाहुवीर्येण सम्मितम् । कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद् विषहेन्मम ।। १६ ।। परंतु मेरे पास मेरे बाहुबलके अनुरूप धनुष नहीं है, जो समरभूमिमें युद्धके लिये प्रयत्न करते समय मेरा वेग सह सके ।। १६ ।। शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः । न हि वोढुं रथः शक्तः शरान् मम यथेप्सितान् ।। १७ ।। इसके सिवा शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते रहनेके लिये मुझे इतने अधिक बाणोंकी आवश्यकता होगी, जो कभी समाप्त न हों तथा मेरी इच्छाके अनुरूप बाणोंको ढोनेके लिये शक्तिशाली रथ भी मेरे पास नहीं है ।। १७ ।। अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान् वातरंहसः । रथं च मेघनिर्घोषं सूर्यप्रतिमतेजसम् ।। १८ ।। तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम् । येन नागान् पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे ।। १९ ।। मैं वायुके समान वेगवान् श्वेत वर्णके दिव्य अश्व तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला एवं सूर्यके समान तेजस्वी रथ चाहता हूँ। इसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णके बल-पराक्रमके अनुसार कोई आयुध इनके पास भी नहीं है, जिससे ये नागों और पिशाचोंको युद्धमें मार सकें ।। १८-१९ ।। उपायं कर्मसिद्धौ च भगवन् वक्तुमर्हसि । निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने ।। २० ।। भगवन्! इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो उपाय सम्भव हो, वह मुझे बताइये, जिससे मैं इस महान् वनमें जल बरसाते हुए इन्द्रको रोक सकूँ ।। २० ।। पौरुषेण तु यत् कार्यं तत् कर्तारौ स्व पावक । करणानि समर्थानि भगवन् दातुमर्हसि ।। २१ ।। भगवन् अग्निदेव! पुरुषार्थसे जो कार्य हो सकता है, उसे हमलोग करनेके लिये तैयार हैं; किंतु इसके लिये सुदृढ़ साधन जुटा देनेकी कृपा आपको करनी चाहिये ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अर्जुन-अग्निसंवादविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२३ ।।
२२४-
चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स भगवान् धूमकेतुर्हुताशनः ।
चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर धूमरूपी ध्वजासे सुशोभित होनेवाले भगवान् हुताशनने दर्शनकी इच्छासे लोकपाल वरुणका चिन्तन किया ॥ १ ॥
आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम् ।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् ॥ २ ॥
अदितिके पुत्र, जलके स्वामी और सदा जलमें ही निवास करनेवाले उन वरुणदेवने, अग्निदेवने मेरा चिन्तन किया है, यह जानकर तत्काल उन्हें दर्शन दिया ॥ २ ॥
तमब्रवीद् धूमकेतुः प्रतिगृह्य जलेश्वरम् ।
चतुर्थं लोकपालानां देवदेवं सनातनम् ॥ ३ ॥
चौथे लोकपाल सनातन देवदेव जलेश्वर वरुणका स्वागत-सत्कार करके धूमकेतु अग्निने उनसे कहा— ॥ ३ ॥
सोमेन राज्ञा यद् दत्तं धनुश्चैवेषुधी च ते ।
तत् प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ॥ ४ ॥
‘वरुणदेव! राजा सोमने आपको जो दिव्य धनुष और अक्षय तरकस दिये हैं, वे दोनों मुझे शीघ्र दीजिये। साथ ही कपियुक्त ध्वजासे सुशोभित रथ भी प्रदान कीजिये’ ॥ ४ ॥
कार्यं च सुमहत् पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति ।
चक्रेण वासुदेवश्च तन्ममाद्य प्रदीयताम् ॥ ५ ॥
‘आज कुन्तीपुत्र अर्जुन गाण्डीव धनुषके द्वारा और भगवान् वासुदेव चक्रके द्वारा मेरा महान् कार्य सिद्ध करेंगे; अतः वह सब आज मुझे दे दीजिये’ ॥ ५ ॥
ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत ।
तदद्भुतं महावीरं यशःकीर्तिविवर्धनम् ॥ ६ ॥
सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च ।
सर्वायुधमहामात्रं परसैन्यप्रधर्षणम् ॥ ७ ॥
एकं शतसहस्रेण सम्मितं राष्ट्रवर्धनम् । चित्रमुच्चावचैर्वर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमव्रणम् ॥ ८ ॥ देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः । प्रादाच्चैव धनूरत्नमक्षय्ये च महेषुधी ॥ ९ ॥ तब वरुणने अग्निदेवसे 'अभी देता हूँ' ऐसा कहकर वह धनुषोंमें रत्नके समान गाण्डीव तथा बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय एवं बड़े तरकस भी दिये। वह धनुष अद्भुत था। उसमें बड़ी शक्ति थी और वह यश एवं कीर्तिको बढ़ानेवाला था। किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे वह टूट नहीं सकता था और दूसरे सब शस्त्रोंको नष्ट कर डालनेकी शक्ति उसमें मौजूद थी। उसका आकार सभी आयुधोंसे बढ़कर था। शत्रुओंकी सेनाको विदीर्ण करनेवाला वह एक ही धनुष दूसरे लाख धनुषोंके बराबर था। वह अपने धारण करनेवालेके राष्ट्रको बढ़ानेवाला एवं विचित्र था। अनेक प्रकारके रंगोंसे उसकी शोभा होती थी। वह चिकना और छिद्रसे रहित था। देवताओं, दानवों और गन्धर्वोंने अनन्त वर्षोंतक उसकी पूजा की थी ॥ ६—९ ॥
रथं च दिव्याश्वयुजं कपिप्रवरकेतनम् । उपेतं राजतैरश्वैर्गान्धर्वैर्हेममालिभिः ॥ १० ॥ इसके सिवा वरुणने दिव्य घोड़ोंसे जुता हुआ एक रथ भी प्रस्तुत किया, जिसकी ध्वजापर श्रेष्ठ कपि विराजमान था। उसमें जुते हुए अश्वोंका रंग चाँदीके समान सफेद था। वे सभी घोड़े गन्धर्वदेशमें उत्पन्न तथा सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे ॥ १० ॥
पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवायुसमैर्जवे । सर्वोपकरणैर्युक्तमजय्यं देवदानवैः ॥ ११ ॥ उनकी कान्ति सफेद बादलोंकी-सी जान पड़ती थी। वे वेगमें मन और वायुकी समानता करते थे। वह रथ सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओंसे युक्त तथा देवताओं और दानवोंके लिये भी अजेय था ॥ ११ ॥
भानुमन्तं महाघोषं सर्वरत्नमनोरमम् । ससर्ज यं सुतपसा भौमनो भुवनप्रभुः ॥ १२ ॥ प्रजापतिरनिर्देश्यं यस्य रूपं रवेरिव । यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजयत् प्रभुः ॥ १३ ॥ उससे तेजोमयी किरणें छिटकती थीं। उसके चलनेपर सब ओर बड़े जोरकी आवाज गूँज उठती थी। वह रथ सब प्रकारके रत्नोंसे जटिल होनेके कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता था। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रजापति विश्वकर्माने बड़ी भारी तपस्याके द्वारा उस रथका निर्माण किया था। उस सूर्यके समान तेजस्वी रथका 'इदमित्थम्' रूपसे वर्णन नहीं हो सकता था। पूर्वकालमें शक्तिशाली सोम (चन्द्रमा)-ने उसी रथपर आरूढ़ हो दानवोंपर विजय पायी थी ॥ १२-१३ ॥
नवमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिया । आश्रितौ तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमावुभौ ॥ १४ ॥ वह रथ नूतन मेघके समान प्रतीत होता था और अपनी दिव्य शोभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था। इन्द्र-धनुषके समान कान्तिवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन उस श्रेष्ठ रथके समीप गये ॥ १४ ॥
तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा । तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूलकेतनः ॥ १५ ॥ उस रथका ध्वजदण्ड बड़ा सुन्दर और सुवर्णमय था। उसके ऊपर सिंह और व्याघ्रके समान भयंकर आकृतिवाला दिव्य वानर बैठा था ॥ १५ ॥
दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत । ध्वजे भूतानि तत्रासन् विविधानि महान्ति च ॥ १६ ॥ नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति । उस रथके शिखरपर बैठा हुआ वह वानर ऐसा जान पड़ता था, मानो शत्रुओंको भस्म कर डालना चाहता हो। उस ध्वजमें और भी नाना प्रकारके बड़े भयंकर प्राणी रहते थे, जिनकी आवाज सुनकर शत्रु-सैनिकोंके होश उड़ जाते थे ॥ १६ १/२ ॥
स तं नानापताकाभिः शोभितं रथसत्तमम् ॥ १७ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य च । संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रकः ॥ १८ ॥ आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा । वह श्रेष्ठ रथ भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे सुशोभित हो रहा था। अर्जुनने कमर कस ली, कवच और तलवार बाँध ली, दस्ताने पहन लिये तथा रथकी परिक्रमा और देवताओंको प्रणाम करके वे उसपर आरूढ़ हुए, ठीक वैसे ही, जैसे कोई पुण्यात्मा विमानपर बैठता है ॥ १७-१८ १/२ ॥
तच्च दिव्यं धनुः श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ १९ ॥ गाण्डीवमुपसंगृह्य बभूव मुदितोऽर्जुनः । हुताशनं पुरस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् ॥ २० ॥ जग्राह बलमास्थाय ज्यया च युयुजे धनुः । मौर्व्यां तु योज्यमानायां बलिना पाण्डवेन ह ॥ २१ ॥ येऽशृण्वन् कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः ।
तदनन्तर, पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसका निर्माण किया था, उस दिव्य एवं श्रेष्ठ गाण्डीव धनुषको हाथमें लेकर अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए। पराक्रमी धनंजयने अग्निदेवको सामने रखकर उस धनुषको हाथमें उठाया और बल लगाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। महाबली पाण्डुकुमारके उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाते समय जिन लोगोंने उसकी टंकार सुनी, उनका हृदय व्यथित हो उठा ॥ १९—२१ १/२ ॥ लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ २२ ॥ बभूव कल्पः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि । वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः ॥ २३ ॥ वह रथ, धनुष तथा अक्षय तरकस पाकर कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निकी सहायता करनेमें समर्थ हो गये। तदनन्तर पावकने भगवान् श्रीकृष्णको एक चक्र दिया, जिसका मध्यभाग वज्रके समान था ॥ २२-२३ ॥ आग्नेयमस्त्रं दयितं स च कल्योऽभवत् तदा । अब्रवीत् पावकश्चैवमेतेन मधुसूदन ॥ २४ ॥ अमानुषानपि रणे जेष्यसि त्वमसंशयम् । अनेन तु मनुष्याणां देवानार्माप चाहवे ॥ २५ ॥ रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाधिकस्तथा । भविष्यसि न संदेहः प्रवरोऽपि निबर्हणे ॥ २६ ॥ उस अग्निप्रदत्त प्रिय अस्त्र चक्रको पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय सहायताके लिये समर्थ हो गये। उनसे अग्निदेवने कहा—'मधुसूदन! इस चक्रके द्वारा आप युद्धमें अमानव प्राणियोंको भी जीत लेंगे, इसमें संशय नहीं है। इसके होनेसे आप युद्धमें मनुष्यों, देवताओं, राक्षसों, पिशाचों, दैत्यों और नागोंसे भी अधिक शक्तिशाली होंगे तथा इन सबका संहार करनेमें भी निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होंगे ॥ २४—२६ ॥ क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत् त्वया माधव शत्रुपु । हत्वाप्रतिहतं संख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ॥ २७ ॥ 'माधव! युद्धमें आप जब-जब इसे शत्रुओंपर चलायेंगे, तब-तब यह उन्हें मारकर और स्वयं किसी अस्त्रसे प्रतिहत न होकर पुनः आपके हाथमें आ जायगा' ॥ २७ ॥ वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् । दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं प्रभुः ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् भगवान् वरुणने भी बिजलीके समान कड़कड़ाहट पैदा करनेवाली कौमोदकी नामक गदा भगवान्को भेंट की, जो दैत्योंका विनाश करनेवाली और भयंकर थी ॥ २८ ॥ ततः पावकमब्रूतां प्रहृष्टावर्जुनाच्युतौ । कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ॥ २९ ॥
कल्यौ स्वो भगवन् योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः । किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सता ॥ ३० ॥ इसके बाद अस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं शस्त्रसम्पन्न अर्जुन और श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर अग्निदेवसे कहा—‘भगवन्! अब हम दोनों रथ और ध्वजासे युक्त हो सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंसे भी युद्ध करनेमें समर्थ हो गये हैं; फिर तक्षक नागके लिये युद्धकी इच्छा रखनेवाले अकेले वज्रधारी इन्द्रसे युद्ध करना क्या बड़ी बात है?’ ॥ २९-३० ॥
अर्जुन उवाच
चक्रपाणिर्हृषीकेशो विचरन् युधि वीर्यवान् । चक्रेण भस्मसात् सर्वं विसृष्टेन तु वीर्यवान् । त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न कुर्याज्जनार्दनः ॥ ३१ ॥ अर्जुन बोले—अग्निदेव! सबकी इन्द्रियोंके प्रेरक ये महापराक्रमी जनार्दन जब हाथमें चक्र लेकर युद्धमें विचरेंगे, उस समय त्रिलोकीमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे ये चक्रके प्रहारसे भस्म न कर सकें ॥ ३१ ॥
गाण्डीवं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अहमप्युत्सहे लोकान् विजेतुं युधि पावक ॥ ३२ ॥ पावक! मैं भी यह गाण्डीव धनुष और ये दोनों बड़े-बड़े अक्षय तरकस लेकर सम्पूर्ण लोकोंको युद्धमें जीत लेनेका उत्साह रखता हूँ ॥ ३२ ॥
सर्वतः परिवार्यैवं दावमेतं महाप्रभो । कामं सम्प्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ॥ ३३ ॥ महाप्रभो! अब आप इस सम्पूर्ण वनको चारों ओरसे घेरकर आज ही इच्छानुसार जलाइये। हम आपकी सहायताके लिये तैयार हैं ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स भगवान् दाशार्हेणार्जुनेन च । तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे ॥ ३४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्ण और अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् अग्निने तेजोमय रूप धारण करके खाण्डववनको सब ओरसे जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३४ ॥
सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तथा । ददाह खाण्डवं दावं युगान्तमिव दर्शयन् ॥ ३५ ॥ सात ज्वालामयी जिह्वाओंवाले अग्निदेव खाण्डव-वनको सब ओरसे घेरकर महाप्रलयका-सा दृश्य उपस्थित करते हुए जलाने लगे ॥ ३५ ॥
प्रतिगृह्य समाविश्य तद् वनं भरतर्षभ ।
मेघस्तनितनिर्घोषः सर्वभूतान्यकम्पयत् ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस वनको चारों ओरसे अपनी लपटोंमें लपेटकर और उसके भीतरी भागमें भी व्याप्त होकर अग्निदेव मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर घोष करते हुए समस्त प्राणियोंको कँपाने लगे ॥ ३६ ॥
दह्यतस्तस्य च बभौ रूपं दावस्य भारत ।
मेरोरिव नगेन्द्रस्य कीर्णस्यांशुमतोऽंशुभिः ॥ ३७ ॥
भारत! उस जलते हुए खाण्डववनका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त पर्वतराज मेरुका सम्पूर्ण कलेवर उद्दीप्त हो उठा हो ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि गाण्डीवादिदाने
चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें गाण्डीवादिदानविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥
२२५-
पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा
वैशम्पायन उवाच
तौ रथाभ्यां रथश्रेष्ठौ दावस्योभयतः स्थितौ ।
दिक्षु सर्वासु भूतानां चक्राते कदनं महत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ वीर दो रथोंपर बैठकर खाण्डववनके दोनों ओर खड़े हो गये और सब दिशाओंमें घूम-घूमकर प्राणियोंका महान् संहार करने लगे ॥ १ ॥
यत्र यत्र च दृश्यन्ते प्राणिनः खाण्डवालयाः ।
पलायन्तः प्रवीरौ तौ तत्र तत्राभ्यधावताम् ॥ २ ॥
खाण्डववनमें रहनेवाले प्राणी जहाँ-जहाँ भागते दिखायी देते, वहीं-वहीं वे दोनों प्रमुख वीर उनका पीछा करते ॥ २ ॥
छिद्रं न स्म प्रपश्यन्ति रथयोराशुचारिणोः ।
आविद्धावेव दृश्येते रथिनौ तौ रथोत्तमौ ॥ ३ ॥