भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1549

**अर्जुन बोले—**भगवन्! मेरे पास बहुत-से दिव्य एवं उत्तम अस्त्र तो हैं, जिनके द्वारा मैं एक क्या, अनेक वज्रधारियोंसे युद्ध कर सकता हूँ ।। १५ ।। धनुर्मे नास्ति भगवन् बाहुवीर्येण सम्मितम् । कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद् विषहेन्मम ।। १६ ।। परंतु मेरे पास मेरे बाहुबलके अनुरूप धनुष नहीं है, जो समरभूमिमें युद्धके लिये प्रयत्न करते समय मेरा वेग सह सके ।। १६ ।। शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः । न हि वोढुं रथः शक्तः शरान् मम यथेप्सितान् ।। १७ ।। इसके सिवा शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते रहनेके लिये मुझे इतने अधिक बाणोंकी आवश्यकता होगी, जो कभी समाप्त न हों तथा मेरी इच्छाके अनुरूप बाणोंको ढोनेके लिये शक्तिशाली रथ भी मेरे पास नहीं है ।। १७ ।। अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान् वातरंहसः । रथं च मेघनिर्घोषं सूर्यप्रतिमतेजसम् ।। १८ ।। तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम् । येन नागान् पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे ।। १९ ।। मैं वायुके समान वेगवान् श्वेत वर्णके दिव्य अश्व तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला एवं सूर्यके समान तेजस्वी रथ चाहता हूँ। इसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णके बल-पराक्रमके अनुसार कोई आयुध इनके पास भी नहीं है, जिससे ये नागों और पिशाचोंको युद्धमें मार सकें ।। १८-१९ ।। उपायं कर्मसिद्धौ च भगवन् वक्तुमर्हसि । निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने ।। २० ।। भगवन्! इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो उपाय सम्भव हो, वह मुझे बताइये, जिससे मैं इस महान् वनमें जल बरसाते हुए इन्द्रको रोक सकूँ ।। २० ।। पौरुषेण तु यत् कार्यं तत् कर्तारौ स्व पावक । करणानि समर्थानि भगवन् दातुमर्हसि ।। २१ ।। भगवन् अग्निदेव! पुरुषार्थसे जो कार्य हो सकता है, उसे हमलोग करनेके लिये तैयार हैं; किंतु इसके लिये सुदृढ़ साधन जुटा देनेकी कृपा आपको करनी चाहिये ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अर्जुन-अग्निसंवादविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२३ ।।