महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1548, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय ब्रह्माजीने कहा—'अनल! अब जिस प्रकार तुम इन्द्रके देखते-देखते अभी खाण्डववन जला सकोगे, वह उपाय सुनो ।। ७ ।। नरनारायणौ यौ तौ पूर्वदेवौ विभावसो । सम्प्राप्तौ मानुषे लोके कार्यार्थं हि दिवौकसाम् ॥ ८ ॥ 'विभावसो! आदिदेव नर और नारायण मुनि इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए हैं ।। ८ ।। अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते । तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपतः ॥ ९ ॥ 'वहाँके लोग उन्हें अर्जुन और वासुदेवके नामसे जानते हैं। वे दोनों इस समय खाण्डववनके पास ही एक साथ बैठे हैं ।। ९ ।। तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च । ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशैरपि ॥ १० ॥ 'उन दोनोंसे तुम खाण्डववन जलानेके कार्यमें सहायताकी याचना करो। तब तुम इन्द्रादि देवताओंसे रक्षित होनेपर भी उस वनको जला सकोगे ।। १० ।। तौ तु सत्त्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः । देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः ॥ ११ ॥ 'वे दोनों वीर एक साथ होनेपर यत्नपूर्वक वनके सारे जीवोंको भी रोकेंगे और देवराज इन्द्रका भी सामना करेंगे, मुझे इसमें कोई संशय नहीं है' ।। ११ ।। एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः । कृष्णपार्थवुपागम्य यमर्थं त्वभ्यभाषत ॥ १२ ॥ तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम । तच्छ्रुत्वा वचनं त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम् ॥ १३ ॥ अब्रवीन्नृपशार्दूल तत्कालसदृशं वचः । दिधक्षुं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः ॥ १४ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही ।। १२—१४ ।।
अर्जुन उवाच
उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च । यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्रधरान् बहून् ॥ १५ ॥