महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1559, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहता रथवृन्देन नानारूपेण वासवः । आकाशं समवाकीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने साथ अनेक प्रकारके विशाल रथ ले लिये और आकाशमें स्थित हो देवताओंके स्वामी वे इन्द्र जलकी वर्षा करने लगे ॥ १८ ॥
ततोऽक्षमात्रा व्यसृजन् धाराः शतसहस्रशः । चोदिता देवराजेन जलदाः खाण्डवं प्रति ॥ १९ ॥ देवराज इन्द्रसे प्रेरित होकर मेघ रथके धुरेके समान मोटी-मोटी असंख्य धाराएँ खाण्डववनमें गिराने लगे ॥ १९ ॥
असम्प्राप्तास्तु ता धारास्तेजसा जातवेदसः । ख एव समशुष्यन्त न काश्चित् पावकं गताः ॥ २० ॥ परंतु अग्निके तेजसे वे धाराएँ वहाँ पहुँचनेसे पहले आकाशमें ही सूख जाती थीं। अग्नितक कोई धारा पहुँची ही नहीं ॥ २० ॥
ततो नमुचिहा क्रुद्धो भृशमर्चिष्मतस्तदा । पुनरेव महामेघैरम्भांसि व्यसृजद् बहु ॥ २१ ॥ तब नमुचिनाशक इन्द्रदेव अग्निपर अत्यन्त कुपित हो पुनः बड़े-बड़े मेघोंद्वारा बहुत जलकी वर्षा कराने लगे ॥ २१ ॥
अर्चिर्धाराभिसम्बद्धं धूमविद्युत्समाकुलम् । बभूव तद् वनं घोरं स्तनयित्नुसमाकुलम् ॥ २२ ॥ आगकी लपटों और जलकी धाराओंसे संयुक्त होनेपर उस वनमें धुआँ उठने लगा। सब ओर बिजली चमकने लगी और चारों ओर मेघोंकी गड़गड़ाहटका शब्द गूँज उठा। इस प्रकार खाण्डववनकी दशा बड़ी भयंकर हो गयी ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि इन्द्रक्रोधे पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें इन्द्रकोपविषयक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२५ ॥