महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1560, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवताओं आदिके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
तस्याथ वर्षतो वारि पाण्डवः प्रत्यवारयत् ।
शरवर्षेण बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वर्षा करते हुए इन्द्रकी उस जलधाराको पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने उत्तम अस्त्रका प्रदर्शन करते हुए बाणोंकी बौछारसे रोक दिया ॥ १ ॥
खाण्डवं च वनं सर्वं पाण्डवो बहुभिः शरैः ।
आच्छादयदमेयात्मा नीहारेणेव चन्द्रमाः ॥ २ ॥
अमित आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डव अर्जुनने बहुत-से बाणोंकी वर्षा करके सारे खाण्डववनको ढँक दिया, जैसे कुहरा चन्द्रमाको ढक देता है ॥ २ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।
संछाद्यमाने खे बाणैरस्यता सव्यसाचिना ॥ ३ ॥
सव्यसाची अर्जुनके चलाये हुए बाणोंसे सारा आकाश छा गया था; इसलिये कोई भी प्राणी उस वनसे निकल नहीं पाता था ॥ ३ ॥
तक्षकस्तु न तत्रासीन्नागराजो महाबलः ।
दह्यमाने वने तस्मिन् कुरुक्षेत्रं गतो हि सः ॥ ४ ॥
जब खाण्डववन जलाया जा रहा था, उस समय महाबली नागराज तक्षक वहाँ नहीं था, कुरुक्षेत्र चला गया था ॥ ४ ॥
अश्वसेनोऽभवत् तत्र तक्षकस्य सुतो बली ।
स यत्नमकरोत् तीव्रं मोक्षार्थं जातवेदसः ॥ ५ ॥
परंतु तक्षकका बलवान् पुत्र अश्वसेन वहीं रह गया था। उसने उस आगसे अपनेको छुड़ानेके लिये बड़ा भारी प्रयत्न किया ॥ ५ ॥
न शशाक स निर्गन्तुं निरुद्धोऽर्जुनपत्रिभिः ।
मोक्षयामास तं माता निगीर्य भुजगात्मजा ॥ ६ ॥
किंतु अर्जुनके बाणोंसे रुँध जानेके कारण वह बाहर निकल न सका। उसकी माता सर्पिणीने उसे निगलकर उस आगसे बचाया ॥ ६ ॥
तस्य पूर्वं शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगीर्य च ।
निगीर्यमाणा साक्रामत् सुतं नागी मुमुक्षया ॥ ७ ॥