महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1561, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसने पहले उसका मस्तक निगल लिया। फिर धीरे-धीरे पूँछतकका भाग निगल गयी। निगलते-निगलते ही उस नागिनने पुत्रको बचानेके लिये आकाशमें उड़कर निकल भागनेकी चेष्टा की ॥ ७ ॥
तस्याः शरेण तीक्ष्णेन पृथुधारेण पाण्डवः । शिरश्चिच्छेद गच्छन्त्यास्तामपश्यच्छचीपतिः ॥ ८ ॥ परंतु पाण्डुकुमार अर्जुनने मोटी धारवाले तीखे बाणसे उस भागती हुई सर्पिणीका मस्तक काट दिया। शचीपति इन्द्रने उसकी यह अवस्था अपनी आँखों देखी ॥ ८ ॥
तं मुमोचयिषुर्वज्री वातवर्षेण पाण्डवम् । मोहयामास तत्कालमश्वसेनस्त्वमुच्यत ॥ ९ ॥ तब उसे छुड़ानेकी इच्छासे वज्रधारी इन्द्रने आँधी और वर्षा चलाकर पाण्डुकुमार अर्जुनको उस समय मोहित कर दिया। इतनेहीमें तक्षकका पुत्र अश्वसेन उस संकटसे मुक्त हो गया ॥ ९ ॥
तां च मायां तदा दृष्ट्वा घोरां नागेन वञ्चितः । द्विधा त्रिधा च खगतान् प्राणिनः पाण्डवोऽच्छिनत् ॥ १० ॥ तब उस भयानक मायाको देखकर नागसे ठगे गये पाण्डुपुत्र अर्जुनने आकाशमें उड़नेवाले प्राणियोंके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले ॥ १० ॥
शशाप तं च संक्रुद्धो बीभत्सुर्जिह्मगामिनम् । पावको वासुदेवश्चाप्यप्रतिष्ठो भविष्यसि ॥ ११ ॥ फिर क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने टेढ़ी चालसे चलनेवाले उस नागको शाप दिया—‘अरे! तू आश्रयहीन हो जायगा।’ अग्नि और श्रीकृष्णने भी उसका अनुमोदन किया ॥ ११ ॥
ततो जिष्णुः सहस्राक्षं खं वितत्याशुगैः शरैः । योधयामास संक्रुद्धो वञ्चनां तामनुस्मरन् ॥ १२ ॥ तदनन्तर अपने साथ की हुई वंचनाको बार-बार स्मरण करके क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा आकाशको आच्छादित करके इन्द्रके साथ युद्ध छेड़ दिया ॥ १२ ॥
देवराजोऽपि तं दृष्ट्वा संरब्धं समरेऽर्जुनम् । स्वमस्त्रमसृजत् तीव्रं छादयित्वाखिलं नभः ॥ १३ ॥ देवराजने भी अर्जुनको युद्धमें कुपित देख सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित करते हुए अपने दुस्सह अस्त्र (ऐन्द्रास्त्र)-को प्रकट किया ॥ १३ ॥
ततो वायुर्महाघोषः क्षोभयन् सर्वसागरान् । वियत्स्थो जनयन् मेघाञ्जलधारासमाकुलान् ॥ १४ ॥ फिर तो बड़ी भारी आवाजके साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी। उसने समस्त समुद्रोंको क्षुब्ध करते हुए आकाशमें स्थित हो मूसलाधार पानी बरसानेवाले मेघोंको उत्पन्न किया ॥ १४ ॥