भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1562

ततोऽशनिमुचो घोरांस्तडित्स्तनितनिःस्वनान् । तद्विघातार्थमसृजदर्जुनोऽप्यस्त्रमुत्तमम् ॥ १५ ॥ वायव्यमभिमन्त्र्याथ प्रतिपत्तिविशारदः । तेनेन्द्राशनिमेघानां वीर्यौजस्तद् विनाशितम् ॥ १६ ॥ वे भयंकर मेघ बिजलीकी कड़कड़ाहटके साथ धरतीपर वज्र गिराने लगे। उस अस्त्रके प्रतिकारकी विद्यामें कुशल अर्जुनने उन मेघोंको नष्ट करनेके लिये अभिमन्त्रित करके वायव्य नामक उत्तम अस्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रने इन्द्रके छोड़े हुए वज्र और मेघोंका ओज एवं बल नष्ट कर दिया ॥ १५-१६ ॥

जलधाराश्च ताः शोषं जग्मुर्नैशूश्च विद्युत : । क्षणेन चाभवद् व्योम सम्प्रशान्तरजस्तमः ॥ १७ ॥ जलकी वे सारी धाराएँ सूख गयीं और बिजलियाँ भी नष्ट हो गयीं। क्षणभरमें आकाश धूल और अन्धकारसे रहित हो गया ॥ १७ ॥

सुखशीतानिलवहं प्रकृतिस्थार्कमण्डलम् । निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग् विविधाकृतिः ॥ १८ ॥ सिच्यमानो वसाघैस्तैः प्राणिनां देहनिःसृतैः । प्रजज्वालाथ सोऽर्चिष्मान् स्वनादैः पूरयञ्जगत् ॥ १९ ॥ सुखदायिनी शीतल हवा चलने लगी। सूर्यमण्डल स्वाभाविक स्थितिमें दिखायी देने लगा। अग्निदेव प्रतीकारशून्य होनेके कारण बहुत प्रसन्न हुए और अनेक रूपोंमें प्रकट हो प्राणियोंके शरीरसे निकली हुई वसाके समूहसे अभिषिक्त होकर बड़ी-बड़ी लपटोंके साथ प्रज्वलित हो उठे। उस समय अपनी आवाजसे वे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥

कृष्णाभ्यां रक्षितं दृष्ट्वा तं च दावमहंकृताः । खमुत्पेतुर्महाराज सुपर्णाद्याः पतत्रिणः ॥ २० ॥ महाराज! उस खाण्डववनको श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित देख अहंकारसे युक्त सुन्दर पंख आदि अंगोंवाले पक्षी आकाशमें उड़ने लगे ॥ २० ॥

गरुत्मान् वज्रसदृशैः पक्षतुण्डनखैस्तथा । प्रहर्तुकामो न्यपतदाकाशात् कृष्णपाण्डवौ ॥ २१ ॥ एक गरुडजातीय पक्षी* वज्रके समान पाँख, चोंच और पंजोंसे प्रहार करनेकी इच्छा रखकर आकाशसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर झपटा ॥ २१ ॥

तथैवोरगसङ्घाताः पाण्डवस्य समीपतः । उत्सृजन्तो विषं घोरं निपेतुर्र्ज्वलिताननाः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले नागोंके समुदाय भी पाण्डव अर्जुनके समीप भयानक जहर उगलते हुए उनकी ओर टूट पड़े ॥ २२ ॥