महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1563, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतांश्चकर्त शरैः पार्थः सरोषाग्निसमुक्षितैः । विविशुश्चापि तं दीप्तं देहाभावाय पावकम् ॥ २३ ॥ यह देख अर्जुनने रोषाग्निप्रेरित बाणोंद्वारा उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और वे सभी अपने शरीरको भस्म करनेके लिये उस जलती हुई आगमें समा गये ॥ २३ ॥
ततोऽसुराः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । उत्पेतुर्नादमतुलमुत्सृजन्तो रणार्थिनः ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग युद्धके लिये उत्सुक हो अनुपम गर्जना करते हुए वहाँ दौड़े आये ॥ २४ ॥
अयःकणपचक्राश्मभुशुण्ड्युद्यतबाहवः । कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः क्रोधसम्मूर्च्छितौजसः ॥ २५ ॥ किन्हींके हाथमें लोहेकी गोली छोड़नेवाले यन्त्र (तोप, बंदूक आदि) थे और कुछ लोगोंने हाथोंमें चक्र, पत्थर एवं भुशुण्डी उठा रखी थी। क्रोधाग्निसे बढ़े हुए तेजवाले वे सब-के-सब श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालना चाहते थे ॥ २५ ॥
तेषामतिव्याहरतां शस्त्रवर्षं प्रमुञ्चताम् । प्रममाथोत्तमाङ्गानि बीभत्सुर्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥ वे लोग बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। उस समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उन सबके सिर उड़ा दिये ॥ २६ ॥
कृष्णश्च सुमहातेजाश्चक्रेणारिविनाशनः । दैत्यदानवसङ्घानां चकार कदनं महत् ॥ २७ ॥ शत्रुविनाशन महातेजस्वी श्रीकृष्णने भी चक्रद्वारा दैत्यों और दानवोंके समुदायका महान् संहार कर दिया ॥ २७ ॥
अथापरे शरैर्विद्धाश्चक्रवेगेरितास्तथा । वेलामिव समासाद्य व्यतिष्ठन्नमितौजसः ॥ २८ ॥ फिर दूसरे-दूसरे अमित तेजस्वी दैत्य-दानव बाणोंसे घायल और चक्रवेगसे कम्पित हो तटपर आकर रुक जानेवाली समुद्रकी लहरोंके समान एक सीमातक ही ठहर गये—आगे न बढ़ सके ॥ २८ ॥
ततः शक्रोऽतिसंक्रुद्धस्त्रिदशानां महेश्वरः । पाण्डुरं गजमास्थाय तावुभौ समुपाद्रवत् ॥ २९ ॥ तब देवताओंके महाराज इन्द्र श्वेत ऐरावतपर आरूढ़ हो अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन दोनोंकी ओर दौड़े ॥ २९ ॥
वेगेनाशनिमादाय वज्रमस्त्रं च सोऽसृजत् । हतावेताविति प्राह सुरानसुरसूदनः ॥ ३० ॥