महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1565, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंरुद्र, वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव तथा अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाले साध्यगण—ये और दूसरे बहुत-से देवता नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनकी ओर बढ़े॥ ३७-३८ १/२॥
तत्राद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे॥ ३९॥
युगान्तसमरूपाणि भूतसम्मोहनानि च।
तथा दृष्ट्वा सुसंरब्धं शक्रं देवैः सहाच्युतौ॥ ४०॥
अभीतौ युधि दुर्धर्षौ तस्थतुः सज्जकार्मुकौ।
उस महासंग्राममें प्रलयकालके समान रूपवाले तथा प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाले अद्भुत अपशकुन दिखायी देने लगे। देवताओंसहित इन्द्रको रोषमें भरा देख अपनी महिमासे च्युत न होनेवाले निर्भय तथा दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन धनुष तानकर युद्धके लिये खड़े हो गये॥ ३९-४० १/२॥
आगच्छतस्ततो देवानुभौ युद्धविशारदौ॥ ४१॥
व्यताडयेतां संक्रुद्धौ शरैर्वज्रोपमैस्तदा।
तदनन्तर वे दोनों युद्धकुशल वीर कुपित हो अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा वहाँ आते हुए देवताओंको घायल करने लगे॥ ४१ १/२॥
असकृद् भग्नसंकल्पाः सुराश्च बहुशः कृताः॥ ४२॥
भयाद् रणं परित्यज्य शक्रमेवाभिशिश्रियुः।
बहुत-से देवता बार-बार प्रयत्न करनेपर भी कभी सफलमनोरथ न हो सके। उनकी आशा टूट गयी और वे भयके मारे युद्ध छोड़कर इन्द्रकी ही शरणमें चले गये॥ ४२ १/२॥
दृष्ट्वा निवारितान् देवान् माधवेनार्जुनेन च॥ ४३॥
आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनयो नभसि स्थिताः।
श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा देवताओंकी गति कुण्ठित हुई देख आकाशमें खड़े हुए महर्षिगण बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४३ १/२॥
शक्रश्चापि तयोर्वीर्यमुपलभ्यासकृद् रणे॥ ४४॥
बभूव परमप्रीतो भूयश्चैतावयोधयत्।
इन्द्र भी उस युद्धमें बार-बार उन दोनों वीरोंका पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए और पुनः उन दोनोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ४४ १/२॥
ततोऽश्मवर्षं सुमहद् व्यसृजत् पाकशासनः॥ ४५॥
भूय एव तदा वीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः।
तदनन्तर इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुनः उनपर पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की॥ ४५ १/२॥
तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षितः॥ ४६॥