महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रुद्र, वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव तथा अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाले साध्यगण—ये और दूसरे बहुत-से देवता नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनकी ओर बढ़े॥ ३७-३८ १/२॥
तत्राद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे॥ ३९॥
युगान्तसमरूपाणि भूतसम्मोहनानि च।
तथा दृष्ट्वा सुसंरब्धं शक्रं देवैः सहाच्युतौ॥ ४०॥
अभीतौ युधि दुर्धर्षौ तस्थतुः सज्जकार्मुकौ।
उस महासंग्राममें प्रलयकालके समान रूपवाले तथा प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाले अद्भुत अपशकुन दिखायी देने लगे। देवताओंसहित इन्द्रको रोषमें भरा देख अपनी महिमासे च्युत न होनेवाले निर्भय तथा दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन धनुष तानकर युद्धके लिये खड़े हो गये॥ ३९-४० १/२॥
आगच्छतस्ततो देवानुभौ युद्धविशारदौ॥ ४१॥
व्यताडयेतां संक्रुद्धौ शरैर्वज्रोपमैस्तदा।
तदनन्तर वे दोनों युद्धकुशल वीर कुपित हो अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा वहाँ आते हुए देवताओंको घायल करने लगे॥ ४१ १/२॥
असकृद् भग्नसंकल्पाः सुराश्च बहुशः कृताः॥ ४२॥
भयाद् रणं परित्यज्य शक्रमेवाभिशिश्रियुः।
बहुत-से देवता बार-बार प्रयत्न करनेपर भी कभी सफलमनोरथ न हो सके। उनकी आशा टूट गयी और वे भयके मारे युद्ध छोड़कर इन्द्रकी ही शरणमें चले गये॥ ४२ १/२॥
दृष्ट्वा निवारितान् देवान् माधवेनार्जुनेन च॥ ४३॥
आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनयो नभसि स्थिताः।
श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा देवताओंकी गति कुण्ठित हुई देख आकाशमें खड़े हुए महर्षिगण बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४३ १/२॥
शक्रश्चापि तयोर्वीर्यमुपलभ्यासकृद् रणे॥ ४४॥
बभूव परमप्रीतो भूयश्चैतावयोधयत्।
इन्द्र भी उस युद्धमें बार-बार उन दोनों वीरोंका पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए और पुनः उन दोनोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ४४ १/२॥
ततोऽश्मवर्षं सुमहद् व्यसृजत् पाकशासनः॥ ४५॥
भूय एव तदा वीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः।
तदनन्तर इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुनः उनपर पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की॥ ४५ १/२॥
तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षितः॥ ४६॥
विफलं क्रियमाणं तत् समवेक्ष्य शतक्रतुः ।
भूयः संवर्धयामास तद्वर्षं पाकशासनः ॥ ४७ ॥
अर्जुनने अत्यन्त अमर्षमें भरकर अपने बाणोंद्वारा वह सारी वर्षा नष्ट कर दी। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पाकशासन इन्द्रने उस पत्थरोंकी वर्षाको विफल हुई देख पुनः पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा की ॥ ४६-४७ ॥
सोऽश्मवर्षं महावेगैरिषुभिः पाकशासनिः ।
विलयं गमयामास हर्षयन् पितरं तथा ॥ ४८ ॥
यह देख इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पिताका हर्ष बढ़ाते हुए महान् वेगशाली बाणोंद्वारा पत्थरोंकी उस वृष्टिको फिर विलीन कर दिया ॥ ४८ ॥
तत उत्पाट्य पाणिभ्यां मन्दराच्छिखरं महत् ।
सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥ ४९ ॥
इसके बाद इन्द्रने पाण्डुनन्दन अर्जुनको मारनेके लिये अपने दोनों हाथोंसे मन्दर पर्वतका महान् शिखर वृक्षोंसहित उखाड़ लिया और उसे उनके ऊपर चलाया ॥ ४९ ॥
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलिताग्रैरजिह्मगैः ।
शरैर्विध्वंसयामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा ॥ ५० ॥
यह देख अर्जुनने प्रज्वलित नोकवाले वेगवान् एवं सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा उस पर्वत-शिखरको हजारों टुकड़े करके गिरा दिया ॥ ५० ॥
गिरेर्विशीर्यमाणस्य तस्य रूपं तदा बभौ ।
सार्कचन्द्रग्रहस्येव नभसः परिशीर्यतः ॥ ५१ ॥
छिन्न-भिन्न होकर गिरता हुआ वह पर्वतशिखर ऐसा जान पड़ता था मानो सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह आकाशसे टूटकर गिर रहे हों ॥ ५१ ॥
तेनाभिपतिता दावं शैलेन महता भृशम् ।
शृङ्गेण निहतास्तत्र प्राणिनः खाण्डवालयाः ॥ ५२ ॥
वहाँ गिरे हुए उस महान् पर्वतशिखरके द्वारा खाण्डववनमें निवास करनेवाले बहुतसे प्राणी मारे गये ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि देवकृष्णार्जुनयुद्धे
षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें देवताओंके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२६ ॥
* यह विष्णुवाहन गरुडसे भिन्न था।
(मयदर्शनपर्व)
(मयदर्शनपर्व)
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा
वैशम्पायन उवाच
तथा शैलनिपातेन भीषिताः खाण्डवालयाः ।
दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पर्वतशिखरके गिरनेसे खाण्डववनमें रहनेवाले दानव, राक्षस, नाग, चीते तथा रीछ आदि वनचर प्राणी भयभीत हो उठे ।। १ ।।
द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा ।
मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा ॥ २ ॥
समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातयः ।
मदकी धारा बहानेवाले हाथी, शार्दूल, केसरी, सिंह, मृग, भैंस, सैकड़ों पक्षी तथा दूसरी-दूसरी जातिके प्राणी अत्यन्त उद्विग्न हो इधर-उधर भागने लगे ।। २ १/२ ।।
तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ ॥ ३ ॥
उत्पातनादशब्देन त्रासिता इव च स्थिताः ।
ते वनं प्रसमीक्ष्याथ दह्यमानमनेकधा ॥ ४ ॥
कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् ।
उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त-से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे ।। ३-४ १/२ ।।
तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः ॥ ५ ॥
ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव ।
उस भयंकर आर्तनाद और अग्निदेवकी गर्जनासे वहाँका सम्पूर्ण आकाश मानो उत्पातकालिक मेघोंकी गर्जनासे गूँज रहा था ।। ५ १/२ ।।
ततः कृष्णो महाबाहुः स्वतेजोभास्वरं महत् ॥ ६ ॥
चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः ।
तब महाबाहु श्रीकृष्णने अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाले उस अत्यन्त भयंकर महान् चक्रको उन दैत्य आदि प्राणियोंके विनाशके लिये छोड़ा ।। ६ १/२ ।।
तेनार्ता जातयः क्षुद्राः सदानवनिशाचराः ।। ७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1569)
श्रीकृष्ण और अर्जुनका देवताओंसे युद्ध
अर्जुन और श्रीकृष्णको इन्द्रका वरदान
निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् । उस चक्रके प्रहारसे पीड़ित हो दानव, निशाचर आदि समस्त क्षुद्र प्राणी सौ-सौ टुकड़े होकर क्षणभरमें आगमें गिर गये ॥ ७१/२ ॥ तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः ॥ ८ ॥ वसारुधिरसम्पृक्ताः संध्यायामिव तोयदाः । श्रीकृष्णके चक्रसे विदीर्ण हुए दैत्य मेदा तथा रक्तमें सनकर संध्याकालके मेघोंकी भाँति दिखायी देने लगे ॥ ८१/२ ॥ पिशाचान् पक्षिणो नागान् पशूंश्चैव सहस्रशः ॥ ९ ॥ निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत् तत्र भारत । भारत! भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सहस्रों पिशाचों, पक्षियों, नागों तथा पशुओंका वध करते हुए कालके समान विचर रहे थे ॥ ९१/२ ॥ क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः ॥ १० ॥ छित्त्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः । शत्रुघाती श्रीकृष्णके द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियोंका संहार करके पुनः उनके हाथमें चला आता था ॥ १०१/२ ॥ तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥ बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा । इस प्रकार पिशाच, नाग तथा राक्षसोंका संहार करनेवाले सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप उस समय बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १११/२ ॥ समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः ॥ १२ ॥ विजेता नाभवत् कश्चित् कृष्णपाण्डवयोर्मृधे । वहाँ सब ओरसे सम्पूर्ण दानव एकत्र हो गये थे, तथापि उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं निकला, जो युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत सके ॥ १२१/२ ॥ तयोर्बलात् परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः ॥ १३ ॥ नाशक्नुवञ्छमयितुं तदाभूवन् पराङ्मुखाः । जब देवतालोग उन दोनोंके बलसे खाण्डववनकी रक्षा करने और उस आगको बुझानेमें सफल न हो सके, तब पीठ दिखाकर चल दिये ॥ १३१/२ ॥ शतक्रतुस्तु सम्प्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा ॥ १४ ॥ बभूव मुदितो राजन् प्रशंसन् केशवार्जनौ । राजन्! शतक्रतु इन्द्र देवताओंको विमुख हुआ देख श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४१/२ ॥ निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी ॥ १५ ॥
शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई — ॥ १५१/२ ॥
न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥ १६ ॥ दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ । ‘वासव! तुम्हारे सखा नागप्रवर तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं। वे खाण्डवदाहके समय कुरुक्षेत्र चले गये थे ॥ १६१/२ ॥
न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥ १७ ॥ वासुदेवार्जुनौवेतौ निबोध वचनान्मम । नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥ १८ ॥ भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ । नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि ॥ १९ ॥ ‘भगवान् वासुदेव तथा अर्जुनको किसी प्रकार युद्धसे जीता नहीं जा सकता। मेरे कहनेसे तुम इस बातको समझ लो। ये दोनों पहलेके देवता नर और नारायण हैं। देवलोकमें भी इनकी ख्याति है। इनका बल और पराक्रम कैसा है, यह तुम भी जानते हो। ये अपराजित और दुर्धर्ष वीर हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें किसीके द्वारा भी ये युद्धमें जीते नहीं जा सकते ॥ १७—१९ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ । पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥ २० ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः । ‘ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायण सम्पूर्ण देवताओं, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों तथा नागोंके लिये भी परम पूजनीय हैं ॥ २०१/२ ॥
तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥ २१ ॥ दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम् । ‘अतः इन्द्र! तुम्हें देवताओंके साथ यहाँसे चले जाना ही उचित है। खाण्डववनके इस विनाशको तुम प्रारब्धका ही कार्य समझो’ ॥ २११/२ ॥
इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥ २२ ॥ क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा । यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इन्द्रने इसे ही सत्य माना और क्रोध तथा अमर्ष छोड़कर वे उसी समय स्वर्गलोकको लौट गये ॥ २२१/२ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥ २३ ॥ सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ।
राजन्! महात्मा इन्द्रको वहाँसे प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेनासहित उनके पीछे-पीछे चले गये ॥ २३ १/२ ॥
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ।। २४ ।।
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः ।
उस समय देवताओंसहित देवराज इन्द्रको जाते देख वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनने सिंहनाद किया ॥ २४ १/२ ॥
देवराजे गते राजन् प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ।। २५ ।।
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा ।
राजन्! देवराजके चले जानेपर वीरवर केशव तथा अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो उस समय बेखटके खाण्डववनका दाह कराने लगे ॥ २५ १/२ ॥
स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वार्जुनः सुरान् ।। २६ ।।
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् ।
जैसे प्रबल वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने देवताओंको भगाकर अपने बाणोंके समुदायसे खाण्डववासी प्राणियोंको मारना आरम्भ किया ॥ २६ १/२ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।। २७ ।।
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ।
सव्यसाची अर्जुनके बाण चलाते समय उनके बाणोंसे कट जानेके कारण कोई भी जीव वहाँसे बाहर न निकल सका ॥ २७ १/२ ॥
नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ।। २८ ।।
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे ।
शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम् ।। २९ ।।
अमोघ अस्त्रधारी अर्जुनको उस समय बड़े-से-बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे। वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे ॥ २८-२९ ॥
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव ।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च ।। ३० ।।
वे सभी प्राणी प्राणशून्य होकर साक्षात् कालसे मारे हुएकी भाँति आगमें गिर पड़ते थे। वे वनके किनारे हों या दुर्गम स्थानोंमें हों, कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३० ॥
पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाप्यजायत ।
भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ।। ३१ ।।
पितरों और देवताओंके लोकमें भी खाण्डववनके दाहकी गर्मी पहुँचने लगी। बहुतेरे प्राणियोंके समुदाय कातर हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ।। ३१ ।।
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ।
तेन शब्देन वित्र्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ।। ३२ ।।
हाथी, मृग और चीते भी रोदन करते थे। उनके आर्तनादसे गङ्गा तथा समुद्रके भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे ।। ३२ ।।
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः ।
न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ।। ३३ ।।
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद् योद्धुं कुतः पुनः ।
उस वनमें रहनेवाले जो विद्याधर-जातिके लोग थे, उनकी भी यही दशा थी। महाबाहो! उस समय कोई श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ।। ३४ ।।
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान् हरिः ।
जो कोई राक्षस, दानव और नाग वहाँ एक साथ संघ बनाकर निकलते थे, उन सबको भगवान् श्रीहरि चक्रद्वारा मार देते थे ।। ३४ १/२ ।।
ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद् गतासवः ।। ३५ ।।
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि ।
वे तथा दूसरे विशालकाय प्राणी चक्रके वेगसे शरीर और मस्तक छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण निर्जीव हो प्रज्वलित आगमें गिर पड़ते थे ।। ३५ १/२ ।।
स मांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ।। ३६ ।।
उपर्य्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।
दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च सम्प्रदीप्तमहाननः ।। ३७ ।।
इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये। उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्वामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा ।। ३६-३७ ।।
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन् प्राणभृतां वसाम् ।
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ।। ३८ ।।
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः ।
उनके चमकीले केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे, आँखें पिंगलवर्णकी थीं और वे प्राणियोंके मेदेका रस पी रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गये। उन्हें बड़ी शान्ति मिली ।। ३८ १/२ ।।
तथासुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ।। ३९ ।।
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३९½ ॥
तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥ शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०½ ॥
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥ जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः । स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥ अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला—'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ' ॥ ४१-४२½ ॥
तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा—‘डरो मत’ ॥ ४३१/२ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥ अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा—‘तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् । न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥ अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च । ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च । अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥ उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥
२२८-
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शार्ङ्गोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना
जनमेजय उवाच
किमर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तस्मिन् वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत् प्रचक्ष्व मे ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! इस प्रकार सारे वनके जलाये जानेपर भी अग्निदेवने उन चारों शार्ङ्गकोंको क्यों दग्ध नहीं किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च ।
कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणां न कीर्तितम् ॥ २ ॥
विप्रवर! आपने अश्वसेन नाग तथा मयदानवके न जलनेका कारण तो बताया है; परंतु शार्ङ्गकोंके दग्ध न होनेका कारण नहीं कहा है ॥ २ ॥
तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणामनामयम् ।
कीर्तयस्वाग्निसम्मर्दे कथं ते न विनाशिताः ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! उस भयानक अग्निकाण्डमें उन शार्ङ्गकोंका सकुशल बच जाना, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया बताइये, उनका नाश कैसे नहीं हुआ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथाभूतमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— शत्रुदमन जनमेजय! वैसे भयंकर अग्निकाण्डमें भी अग्निदेवने जिस कारणसे शार्ङ्गकोंको दग्ध नहीं किया और जिस प्रकार वह घटना घटित हुई, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः ।
आसीन्महर्षिः श्रुतवान् मन्दपाल इति श्रुतः ॥ ५ ॥
मन्दपाल नामसे विख्यात एक विद्वान् महर्षि थे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ ५ ॥
स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स्वाध्यायवान् धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
राजन्! वे ऊर्ध्वरेता मुनियोंके मार्ग (ब्रह्मचर्य)-का आश्रय लेकर सदा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न और धर्मपालनमें तत्पर रहते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था और वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ॥ ६ ॥
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत ।
जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥ ७ ॥
भारत! वे अपनी तपस्याको पूरी करके शरीरका त्याग करनेपर पितृलोकमें गये; किंतु वहाँ उन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला ॥ ७ ॥
स लोकानफलान् दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि ।
पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान् दिवौकसः ॥ ८ ॥
उन्होंने तपस्याद्वारा वशमें किये हुए लोकोंको भी निष्फल देखकर धर्मराजके पास बैठे हुए देवताओंसे पूछा ॥ ८ ॥
मन्दपाल उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिताः ।
किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मणः फलम् ॥ ९ ॥
मन्दपाल बोले—देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्यों हैं? (उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है ॥ ९ ॥
तत्राहं तत् करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् ।
फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः ॥ १० ॥
जिसके लिये इस तपस्याका फल ढका हुआ है, मैं उस लोकमें जाकर वह कर्म करूँगा। आपलोग मुझसे उसको बताइये ॥ १० ॥
देवा ऊचुः
ऋणिनो मानवा ब्रह्मन् जायन्ते येन तच्छृणु ।
क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः ॥ ११ ॥
तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा श्रुतैः ।
तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा ॥ १२ ॥
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति—इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है ॥ ११-१२ ॥
त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः ।
प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥ १३ ॥
अतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा।। १३।। पुंनाम्नो नरकात् पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः। तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम।। १४।। श्रुतिका कथन है कि पुत्र 'पुत्' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है। अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये।। १४।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्। क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत्।। १५।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा-विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी।। १५।। स चिन्तयन्नभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान्। शार्ङ्गिकां शार्ङ्गिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्।। १६।। यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ङ्गिक होकर जरिता नामवाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया।। १६।। तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः। तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति।। १७।। बालान् स तानण्डगतान् सह मात्रा मुनिर्वने। जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया। अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये।। १७ १/२ ।। तस्मिन् गते महाभागे लपितां प्रति भारत।। १८।। अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत्। भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई।। १८ १/२ ।। तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान् वने।। १९।। न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्। बभार चैतान् संजातान् स्ववृत्त्या स्नेहविप्लवा।। २०।। अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्वल होकर अपनी वृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही।। १९-२०।। ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः।
मन्दपालश्चरंस्तस्मिन् वने लपितया सह ॥ २१ ॥
उधर वनमें लपिताके साथ विचरते हुए मन्दपाल मुनिने अग्निदेवको खाण्डववनका दाह करनेके लिये आते देखा ॥ २१ ॥
तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान् ।
सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्ब्राह्मणो जातवेदसम् ॥ २२ ॥
पुत्रान् प्रति वदन् भीतो लोकपालं महौजसम् ।
अग्निदेवके संकल्पको जानकर और अपने पुत्रोंकी बाल्यावस्थाका विचार करके ब्रह्मर्षि मन्दपाल भयभीत होकर महातेजस्वी लोकपाल अग्निसे अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये निवेदन करते हुए (ईश्वरकी भाँति) उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ १/२ ॥
मन्दपाल उवाच
त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ॥ २३ ॥
**मन्दपालने कहा—**अग्निदेव! आप सब लोकोंके मुख हैं, आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचाते हैं ॥ २३ ॥
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ।
त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ॥ २४ ॥
पावक! आप समस्त प्राणियोंके अन्तस्तलमें गूढ़-रूपसे विचरते हैं। विद्वान् पुरुष आपको एक (अद्वितीय ब्रह्मरूप) बताते हैं। फिर दिव्य, भौम और जठरानलरूपसे आपके त्रिविध स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं ॥ २४ ॥
त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् ।
त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः ॥ २५ ॥
आपको ही पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान—इन आठ मूर्तियोंमें विभक्त करके ज्ञानी पुरुषोंने आपको यज्ञवाहन बनाया है। महर्षि कहते हैं कि इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि आपने ही की है ॥ २५ ॥
त्वदृते हि जगत् कृत्स्नं सद्यो नश्येद् हुताशन ।
तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ॥ २६ ॥
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ।
हुताशन! आपके बिना सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मणलोग आपको नमस्कार करके अपनी पत्नियों और पुत्रोंके साथ कर्मानुसार प्राप्त की हुई सनातन गतिको प्राप्त होते हैं ॥ २६ १/२ ॥
त्वामग्ने जलदानाहुः खे विषक्तान् सविद्युतः ॥ २७ ॥
अग्ने! आकाशमें विद्युत्कें साथ मेघोंकी जो घटा घिर आती है, उसे भी आपका ही स्वरूप कहते हैं ॥ २७ ॥
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः । जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥ २८ ॥ प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं। महान् तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ॥ २८ ॥ तवैव कर्म विहितं भूतं सर्वं चराचरम् । त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥ २९ ॥ तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २९ ॥ त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम् । त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥ ३० ॥ त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः । आपहीमें हव्य और कव्य यथावत् प्रतिष्ठित हैं। देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण-पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं ॥ ३०१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥ ३१ ॥ तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः । उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥ ३२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले—‘मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?’ ॥ ३१-३२ ॥ तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् । प्रदहन् खाण्डवं दावं मम पुत्रान् विसर्जैय ॥ ३३ ॥ तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा—‘भगवन्! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें’ ॥ ३३ ॥ तथेति तत् प्रतिश्रुत्य भगवान् हव्यवाहनः । खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३४ ॥ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्यानेऽष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२८ ।।
२२९-
एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रज्वलिते वह्नौ शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः ।
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः परायणम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर जब आग प्रज्वलित हुई, तब वे शार्ङ्गक शिशु बहुत दुःखी, व्यथित और अत्यन्त उद्विग्न हो गये। उस समय उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं जान पड़ता था ॥ १ ॥
निशम्य पुत्रकान् बालान् माता तेषां तपस्विनी ।
जरिता शोकदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता ॥ २ ॥
उन बच्चोंको छोटे जानकर उनकी तपस्विनी माता शोक और दुःखसे आतुर हुई जरिता बहुत दुःखी होकर विलाप करने लगी ॥ २ ॥
जरितोवाच
अयमग्निर्दहन् कक्षमित आयाति भीषणः ।
जगत् संदीपयन् भीमो मम दुःखविवर्धनः ॥ ३ ॥
**जरिता बोली—**यह भयानक आग इस वनको जलाती हुई इधर ही बढ़ी आ रही है। जान पड़ता है, यह सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर डालेगी। इसका स्वरूप भयंकर और मेरे दुःखको बढ़ानेवाला है ॥ ३ ॥
इमे च मां कर्षयन्ति शिशवो मन्दचेतसः ।
अबर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः परायणाः ॥ ४ ॥
ये सांसारिक ज्ञानसे शून्य चित्तवाले शिशु मुझे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हें पाँखें नहीं निकलीं और अभीतक ये पैरोंसे भी हीन हैं, हमारे पितरोंके ये ही आधार हैं ॥ ४ ॥
त्रासयंश्चायमायाति लेलिहानो महीरुहान् ।
अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम ॥ ५ ॥
सबको त्रास देती और वृक्षोंको चाटती हुई यह आगकी लपट इधर ही चली आ रही है। हाय! मेरे बच्चे बिना पंखके हैं, मेरे साथ उड़ नहीं सकते ॥ ५ ॥
आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना ।
न च त्यक्तुमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥ ६ ॥
मैं स्वयं भी इन्हें लेकर इस आगसे पार नहीं हो सकूँगी। इन्हें छोड़ भी नहीं सकती। मेरे हृदयमें इनके लिये बड़ी व्यथा हो रही है ॥ ६ ॥ कं तु जह्यामहं पुत्रं कमादाय व्रजाम्यहम् । किं नु मे स्यात् कृतं कृत्वा मन्यध्वं पुत्रकाः कथम् ॥ ७ ॥ मैं किस बच्चेको छोड़ दूँ और किसे साथ लेकर जाऊँ? क्या करनेसे कृतकृत्य हो सकती हूँ? मेरे बच्चो! तुमलोगोंकी क्या राय है? ॥ ७ ॥ चिन्तयाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किंचन । छादयिष्यामि वो गात्रैः करिष्ये मरणं सह ॥ ८ ॥ मैं तुमलोगोंके छुटकारेका उपाय सोचती हूँ; किंतु कुछ भी समझमें नहीं आता। अच्छा; अपने अंगोंसे तुमलोगोंको ढक लूँगी और तुम्हारे साथ ही मैं भी मर जाऊँगी ॥ ८ ॥ जरितारौ कुलं ह्येतज्ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् । सारिसृक्कः प्रजायेत पितॄणां कुलवर्धनः ॥ ९ ॥ स्तम्बमित्रस्तपः कुर्याद् द्रोणो ब्रह्मविदां वरः । इत्येवमुक्त्वा प्रययौ पिता वो निर्घृणः पुरा ॥ १० ॥ पुत्रो! तुम्हारे निर्दयी पिता पहले ही यह कहकर चल दिये कि 'जरितारि ज्येष्ठ है, अतः इस कुलकी रक्षाका भार इसीपर होगा। दूसरा पुत्र सारिसृक्क अपने पितरोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होगा। स्तम्बमित्र तपस्या करेगा और द्रोण ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होगा' ॥ ९-१० ॥ कमुपादाय शक्त्येयं गन्तुं कष्टापदुत्तमा । किं नु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला । नापश्यत् स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदानलात् ॥ ११ ॥ हाय! मुझपर बड़ी भारी कष्टदायिनी आपत्ति आ पड़ी। इन चारों बच्चोंमेंसे किसको लेकर मैं इस आगको पार कर सकूँगी। क्या करनेसे मेरा कार्य सिद्ध हो सकता है? इस प्रकार विचार करते-करते जरिता अत्यन्त विह्वल हो गयी; परंतु अपने पुत्रोंको उस आगसे बचानेका कोई उपाय उस समय उसके ध्यानमें नहीं आया ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणां शार्ङ्गास्ते प्रत्यूचुरथ मातरम् । स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार बिलखती हुई अपनी मातासे वे शार्ङ्गपक्षीके बच्चे बोले—'माँ! तुम स्नेह छोड़कर जहाँ आग न हो, उधर उड़ जाओ ॥ १२ ॥ अस्मास्विह विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव । त्वयि मातर्विनष्टायां न नः स्यात् कुलसंततिः ॥ १३ ॥
‘माँ! यदि हम यहाँ नष्ट हो जायँ तो भी तुम्हारे दूसरे बच्चे हो सकते हैं; परंतु तुम्हारे नष्ट हो जानेपर तो हमारे इस कुलकी परम्परा ही लुप्त हो जायगी।। १३ ।।
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं क्षेमं स्याद् यत् कुलस्य नः।
तद् वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत् तव ।। १४ ।।
‘माँ! इन दोनों बातोंपर विचार करके जिस प्रकार हमारे कुलका कल्याण हो, वही करनेको तुम्हारे लिये यह उत्तम अवसर है ।। १४ ।।
मा त्वं सर्वविनाशाय स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः।
न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ।। १५ ।।
‘तुम हम सब पुत्रोंपर ऐसा स्नेह न करो, जिससे सबका विनाश हो जाय। उत्तम लोककी इच्छा रखनेवाले मेरे पिताका यह कर्म व्यर्थ न हो जाय’ ।। १५ ।।
जरितोवाच
इदमाखोर्बिलं भूमौ वृक्षस्यास्य समीपतः।
तदाविशध्वं त्वरिता वह्नेरत्र न वो भयम् ।। १६ ।।
**जरिता बोली—**मेरे बच्चो! इस वृक्षके पास भूमिमें यह चूहेका बिल है। तुमलोग जल्दी-से-जल्दी इसके भीतर घुस जाओ। इसके भीतर तुम्हें आगसे भय नहीं है ।। १६ ।।
ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः।
एवं प्रतिकृतं मन्ये ज्वलतः कृष्णवर्त्मनः ।। १७ ।।
तुमलोगोंके घुस जानेपर मैं इस बिलका छेद धूलसे बंद कर दूँगी। बच्चो! मेरा विश्वास है, ऐसा करनेसे इस जलती आगसे तुम्हारा बचाव हो सकेगा ।। १७ ।।
तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहन्तुं पांसुसंचयम्।
रोचतामेष वो वादो मोक्षार्थं च हुताशनात् ।। १८ ।।
फिर आग बुझ जानेपर मैं धूल हटानेके लिये यहाँ आ जाऊँगी। आगसे बचनेके लिये मेरी यह बात तुमलोगोंको पसंद आनी चाहिये ।। १८ ।।
शार्ङ्गका ऊचुः
अबर्हान् मांसभूतान् नः क्रव्यादाखुर्विनाशयेत्।
पश्यमाना भयमिदं प्रवेष्टुं नात्र शक्नुमः ।। १९ ।।
**शार्ङ्गक बोले—**अभी हम बिना पंखोंके बच्चे हैं, हमारा शरीर मांसका लोथड़ामात्र है। चूहा मांसभक्षी जीव है, वह हमें नष्ट कर देगा। इस भयको देखते हुए हम इस बिलमें प्रवेश नहीं कर सकते ।। १९ ।।
कथमग्निर्न नो धक्ष्येत् कथमाखुर्न नाशयेत्।
कथं न स्यात् पिता मोघः कथं माता ध्रियेत नः ।। २० ।।