महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई — ॥ १५१/२ ॥
न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥ १६ ॥ दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ । ‘वासव! तुम्हारे सखा नागप्रवर तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं। वे खाण्डवदाहके समय कुरुक्षेत्र चले गये थे ॥ १६१/२ ॥
न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥ १७ ॥ वासुदेवार्जुनौवेतौ निबोध वचनान्मम । नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥ १८ ॥ भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ । नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि ॥ १९ ॥ ‘भगवान् वासुदेव तथा अर्जुनको किसी प्रकार युद्धसे जीता नहीं जा सकता। मेरे कहनेसे तुम इस बातको समझ लो। ये दोनों पहलेके देवता नर और नारायण हैं। देवलोकमें भी इनकी ख्याति है। इनका बल और पराक्रम कैसा है, यह तुम भी जानते हो। ये अपराजित और दुर्धर्ष वीर हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें किसीके द्वारा भी ये युद्धमें जीते नहीं जा सकते ॥ १७—१९ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ । पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥ २० ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः । ‘ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायण सम्पूर्ण देवताओं, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों तथा नागोंके लिये भी परम पूजनीय हैं ॥ २०१/२ ॥
तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥ २१ ॥ दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम् । ‘अतः इन्द्र! तुम्हें देवताओंके साथ यहाँसे चले जाना ही उचित है। खाण्डववनके इस विनाशको तुम प्रारब्धका ही कार्य समझो’ ॥ २११/२ ॥
इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥ २२ ॥ क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा । यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इन्द्रने इसे ही सत्य माना और क्रोध तथा अमर्ष छोड़कर वे उसी समय स्वर्गलोकको लौट गये ॥ २२१/२ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥ २३ ॥ सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ।