भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1570, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1570

निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् । उस चक्रके प्रहारसे पीड़ित हो दानव, निशाचर आदि समस्त क्षुद्र प्राणी सौ-सौ टुकड़े होकर क्षणभरमें आगमें गिर गये ॥ ७१/२ ॥ तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः ॥ ८ ॥ वसारुधिरसम्पृक्ताः संध्यायामिव तोयदाः । श्रीकृष्णके चक्रसे विदीर्ण हुए दैत्य मेदा तथा रक्तमें सनकर संध्याकालके मेघोंकी भाँति दिखायी देने लगे ॥ ८१/२ ॥ पिशाचान् पक्षिणो नागान् पशूंश्चैव सहस्रशः ॥ ९ ॥ निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत् तत्र भारत । भारत! भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सहस्रों पिशाचों, पक्षियों, नागों तथा पशुओंका वध करते हुए कालके समान विचर रहे थे ॥ ९१/२ ॥ क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः ॥ १० ॥ छित्त्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः । शत्रुघाती श्रीकृष्णके द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियोंका संहार करके पुनः उनके हाथमें चला आता था ॥ १०१/२ ॥ तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥ बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा । इस प्रकार पिशाच, नाग तथा राक्षसोंका संहार करनेवाले सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप उस समय बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १११/२ ॥ समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः ॥ १२ ॥ विजेता नाभवत् कश्चित् कृष्णपाण्डवयोर्मृधे । वहाँ सब ओरसे सम्पूर्ण दानव एकत्र हो गये थे, तथापि उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं निकला, जो युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत सके ॥ १२१/२ ॥ तयोर्बलात् परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः ॥ १३ ॥ नाशक्नुवञ्छमयितुं तदाभूवन् पराङ्मुखाः । जब देवतालोग उन दोनोंके बलसे खाण्डववनकी रक्षा करने और उस आगको बुझानेमें सफल न हो सके, तब पीठ दिखाकर चल दिये ॥ १३१/२ ॥ शतक्रतुस्तु सम्प्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा ॥ १४ ॥ बभूव मुदितो राजन् प्रशंसन् केशवार्जनौ । राजन्! शतक्रतु इन्द्र देवताओंको विमुख हुआ देख श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४१/२ ॥ निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी ॥ १५ ॥