महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा—‘डरो मत’ ॥ ४३१/२ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥ अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा—‘तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् । न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥ अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च । ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च । अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥ उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥