भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1574

विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३९½ ॥

तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥ शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०½ ॥

विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥ जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः । स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥ अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला—'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ' ॥ ४१-४२½ ॥

तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥