महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३९½ ॥
तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥ शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०½ ॥
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥ जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः । स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥ अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला—'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ' ॥ ४१-४२½ ॥
तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा—‘डरो मत’ ॥ ४३१/२ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥ अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा—‘तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् । न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥ अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च । ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च । अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥ उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥
२२८-
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शार्ङ्गोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना
जनमेजय उवाच
किमर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तस्मिन् वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत् प्रचक्ष्व मे ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! इस प्रकार सारे वनके जलाये जानेपर भी अग्निदेवने उन चारों शार्ङ्गकोंको क्यों दग्ध नहीं किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च ।
कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणां न कीर्तितम् ॥ २ ॥
विप्रवर! आपने अश्वसेन नाग तथा मयदानवके न जलनेका कारण तो बताया है; परंतु शार्ङ्गकोंके दग्ध न होनेका कारण नहीं कहा है ॥ २ ॥
तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणामनामयम् ।
कीर्तयस्वाग्निसम्मर्दे कथं ते न विनाशिताः ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! उस भयानक अग्निकाण्डमें उन शार्ङ्गकोंका सकुशल बच जाना, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया बताइये, उनका नाश कैसे नहीं हुआ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथाभूतमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— शत्रुदमन जनमेजय! वैसे भयंकर अग्निकाण्डमें भी अग्निदेवने जिस कारणसे शार्ङ्गकोंको दग्ध नहीं किया और जिस प्रकार वह घटना घटित हुई, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः ।
आसीन्महर्षिः श्रुतवान् मन्दपाल इति श्रुतः ॥ ५ ॥
मन्दपाल नामसे विख्यात एक विद्वान् महर्षि थे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ ५ ॥
स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स्वाध्यायवान् धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
राजन्! वे ऊर्ध्वरेता मुनियोंके मार्ग (ब्रह्मचर्य)-का आश्रय लेकर सदा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न और धर्मपालनमें तत्पर रहते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था और वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ॥ ६ ॥
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत ।
जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥ ७ ॥
भारत! वे अपनी तपस्याको पूरी करके शरीरका त्याग करनेपर पितृलोकमें गये; किंतु वहाँ उन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला ॥ ७ ॥
स लोकानफलान् दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि ।
पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान् दिवौकसः ॥ ८ ॥
उन्होंने तपस्याद्वारा वशमें किये हुए लोकोंको भी निष्फल देखकर धर्मराजके पास बैठे हुए देवताओंसे पूछा ॥ ८ ॥
मन्दपाल उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिताः ।
किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मणः फलम् ॥ ९ ॥
मन्दपाल बोले—देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्यों हैं? (उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है ॥ ९ ॥
तत्राहं तत् करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् ।
फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः ॥ १० ॥
जिसके लिये इस तपस्याका फल ढका हुआ है, मैं उस लोकमें जाकर वह कर्म करूँगा। आपलोग मुझसे उसको बताइये ॥ १० ॥
देवा ऊचुः
ऋणिनो मानवा ब्रह्मन् जायन्ते येन तच्छृणु ।
क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः ॥ ११ ॥
तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा श्रुतैः ।
तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा ॥ १२ ॥
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति—इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है ॥ ११-१२ ॥
त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः ।
प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥ १३ ॥
अतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा।। १३।। पुंनाम्नो नरकात् पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः। तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम।। १४।। श्रुतिका कथन है कि पुत्र 'पुत्' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है। अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये।। १४।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्। क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत्।। १५।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा-विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी।। १५।। स चिन्तयन्नभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान्। शार्ङ्गिकां शार्ङ्गिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्।। १६।। यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ङ्गिक होकर जरिता नामवाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया।। १६।। तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः। तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति।। १७।। बालान् स तानण्डगतान् सह मात्रा मुनिर्वने। जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया। अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये।। १७ १/२ ।। तस्मिन् गते महाभागे लपितां प्रति भारत।। १८।। अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत्। भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई।। १८ १/२ ।। तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान् वने।। १९।। न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्। बभार चैतान् संजातान् स्ववृत्त्या स्नेहविप्लवा।। २०।। अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्वल होकर अपनी वृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही।। १९-२०।। ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः।
मन्दपालश्चरंस्तस्मिन् वने लपितया सह ॥ २१ ॥
उधर वनमें लपिताके साथ विचरते हुए मन्दपाल मुनिने अग्निदेवको खाण्डववनका दाह करनेके लिये आते देखा ॥ २१ ॥
तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान् ।
सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्ब्राह्मणो जातवेदसम् ॥ २२ ॥
पुत्रान् प्रति वदन् भीतो लोकपालं महौजसम् ।
अग्निदेवके संकल्पको जानकर और अपने पुत्रोंकी बाल्यावस्थाका विचार करके ब्रह्मर्षि मन्दपाल भयभीत होकर महातेजस्वी लोकपाल अग्निसे अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये निवेदन करते हुए (ईश्वरकी भाँति) उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ १/२ ॥
मन्दपाल उवाच
त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ॥ २३ ॥
**मन्दपालने कहा—**अग्निदेव! आप सब लोकोंके मुख हैं, आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचाते हैं ॥ २३ ॥
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ।
त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ॥ २४ ॥
पावक! आप समस्त प्राणियोंके अन्तस्तलमें गूढ़-रूपसे विचरते हैं। विद्वान् पुरुष आपको एक (अद्वितीय ब्रह्मरूप) बताते हैं। फिर दिव्य, भौम और जठरानलरूपसे आपके त्रिविध स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं ॥ २४ ॥
त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् ।
त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः ॥ २५ ॥
आपको ही पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान—इन आठ मूर्तियोंमें विभक्त करके ज्ञानी पुरुषोंने आपको यज्ञवाहन बनाया है। महर्षि कहते हैं कि इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि आपने ही की है ॥ २५ ॥
त्वदृते हि जगत् कृत्स्नं सद्यो नश्येद् हुताशन ।
तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ॥ २६ ॥
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ।
हुताशन! आपके बिना सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मणलोग आपको नमस्कार करके अपनी पत्नियों और पुत्रोंके साथ कर्मानुसार प्राप्त की हुई सनातन गतिको प्राप्त होते हैं ॥ २६ १/२ ॥
त्वामग्ने जलदानाहुः खे विषक्तान् सविद्युतः ॥ २७ ॥
अग्ने! आकाशमें विद्युत्कें साथ मेघोंकी जो घटा घिर आती है, उसे भी आपका ही स्वरूप कहते हैं ॥ २७ ॥
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः । जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥ २८ ॥ प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं। महान् तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ॥ २८ ॥ तवैव कर्म विहितं भूतं सर्वं चराचरम् । त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥ २९ ॥ तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २९ ॥ त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम् । त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥ ३० ॥ त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः । आपहीमें हव्य और कव्य यथावत् प्रतिष्ठित हैं। देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण-पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं ॥ ३०१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥ ३१ ॥ तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः । उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥ ३२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले—‘मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?’ ॥ ३१-३२ ॥ तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् । प्रदहन् खाण्डवं दावं मम पुत्रान् विसर्जैय ॥ ३३ ॥ तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा—‘भगवन्! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें’ ॥ ३३ ॥ तथेति तत् प्रतिश्रुत्य भगवान् हव्यवाहनः । खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३४ ॥ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्यानेऽष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२८ ।।
२२९-
एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रज्वलिते वह्नौ शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः ।
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः परायणम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर जब आग प्रज्वलित हुई, तब वे शार्ङ्गक शिशु बहुत दुःखी, व्यथित और अत्यन्त उद्विग्न हो गये। उस समय उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं जान पड़ता था ॥ १ ॥
निशम्य पुत्रकान् बालान् माता तेषां तपस्विनी ।
जरिता शोकदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता ॥ २ ॥
उन बच्चोंको छोटे जानकर उनकी तपस्विनी माता शोक और दुःखसे आतुर हुई जरिता बहुत दुःखी होकर विलाप करने लगी ॥ २ ॥
जरितोवाच
अयमग्निर्दहन् कक्षमित आयाति भीषणः ।
जगत् संदीपयन् भीमो मम दुःखविवर्धनः ॥ ३ ॥
**जरिता बोली—**यह भयानक आग इस वनको जलाती हुई इधर ही बढ़ी आ रही है। जान पड़ता है, यह सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर डालेगी। इसका स्वरूप भयंकर और मेरे दुःखको बढ़ानेवाला है ॥ ३ ॥
इमे च मां कर्षयन्ति शिशवो मन्दचेतसः ।
अबर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः परायणाः ॥ ४ ॥
ये सांसारिक ज्ञानसे शून्य चित्तवाले शिशु मुझे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हें पाँखें नहीं निकलीं और अभीतक ये पैरोंसे भी हीन हैं, हमारे पितरोंके ये ही आधार हैं ॥ ४ ॥
त्रासयंश्चायमायाति लेलिहानो महीरुहान् ।
अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम ॥ ५ ॥
सबको त्रास देती और वृक्षोंको चाटती हुई यह आगकी लपट इधर ही चली आ रही है। हाय! मेरे बच्चे बिना पंखके हैं, मेरे साथ उड़ नहीं सकते ॥ ५ ॥
आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना ।
न च त्यक्तुमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥ ६ ॥
मैं स्वयं भी इन्हें लेकर इस आगसे पार नहीं हो सकूँगी। इन्हें छोड़ भी नहीं सकती। मेरे हृदयमें इनके लिये बड़ी व्यथा हो रही है ॥ ६ ॥ कं तु जह्यामहं पुत्रं कमादाय व्रजाम्यहम् । किं नु मे स्यात् कृतं कृत्वा मन्यध्वं पुत्रकाः कथम् ॥ ७ ॥ मैं किस बच्चेको छोड़ दूँ और किसे साथ लेकर जाऊँ? क्या करनेसे कृतकृत्य हो सकती हूँ? मेरे बच्चो! तुमलोगोंकी क्या राय है? ॥ ७ ॥ चिन्तयाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किंचन । छादयिष्यामि वो गात्रैः करिष्ये मरणं सह ॥ ८ ॥ मैं तुमलोगोंके छुटकारेका उपाय सोचती हूँ; किंतु कुछ भी समझमें नहीं आता। अच्छा; अपने अंगोंसे तुमलोगोंको ढक लूँगी और तुम्हारे साथ ही मैं भी मर जाऊँगी ॥ ८ ॥ जरितारौ कुलं ह्येतज्ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् । सारिसृक्कः प्रजायेत पितॄणां कुलवर्धनः ॥ ९ ॥ स्तम्बमित्रस्तपः कुर्याद् द्रोणो ब्रह्मविदां वरः । इत्येवमुक्त्वा प्रययौ पिता वो निर्घृणः पुरा ॥ १० ॥ पुत्रो! तुम्हारे निर्दयी पिता पहले ही यह कहकर चल दिये कि 'जरितारि ज्येष्ठ है, अतः इस कुलकी रक्षाका भार इसीपर होगा। दूसरा पुत्र सारिसृक्क अपने पितरोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होगा। स्तम्बमित्र तपस्या करेगा और द्रोण ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होगा' ॥ ९-१० ॥ कमुपादाय शक्त्येयं गन्तुं कष्टापदुत्तमा । किं नु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला । नापश्यत् स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदानलात् ॥ ११ ॥ हाय! मुझपर बड़ी भारी कष्टदायिनी आपत्ति आ पड़ी। इन चारों बच्चोंमेंसे किसको लेकर मैं इस आगको पार कर सकूँगी। क्या करनेसे मेरा कार्य सिद्ध हो सकता है? इस प्रकार विचार करते-करते जरिता अत्यन्त विह्वल हो गयी; परंतु अपने पुत्रोंको उस आगसे बचानेका कोई उपाय उस समय उसके ध्यानमें नहीं आया ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणां शार्ङ्गास्ते प्रत्यूचुरथ मातरम् । स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार बिलखती हुई अपनी मातासे वे शार्ङ्गपक्षीके बच्चे बोले—'माँ! तुम स्नेह छोड़कर जहाँ आग न हो, उधर उड़ जाओ ॥ १२ ॥ अस्मास्विह विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव । त्वयि मातर्विनष्टायां न नः स्यात् कुलसंततिः ॥ १३ ॥
‘माँ! यदि हम यहाँ नष्ट हो जायँ तो भी तुम्हारे दूसरे बच्चे हो सकते हैं; परंतु तुम्हारे नष्ट हो जानेपर तो हमारे इस कुलकी परम्परा ही लुप्त हो जायगी।। १३ ।।
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं क्षेमं स्याद् यत् कुलस्य नः।
तद् वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत् तव ।। १४ ।।
‘माँ! इन दोनों बातोंपर विचार करके जिस प्रकार हमारे कुलका कल्याण हो, वही करनेको तुम्हारे लिये यह उत्तम अवसर है ।। १४ ।।
मा त्वं सर्वविनाशाय स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः।
न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ।। १५ ।।
‘तुम हम सब पुत्रोंपर ऐसा स्नेह न करो, जिससे सबका विनाश हो जाय। उत्तम लोककी इच्छा रखनेवाले मेरे पिताका यह कर्म व्यर्थ न हो जाय’ ।। १५ ।।
जरितोवाच
इदमाखोर्बिलं भूमौ वृक्षस्यास्य समीपतः।
तदाविशध्वं त्वरिता वह्नेरत्र न वो भयम् ।। १६ ।।
**जरिता बोली—**मेरे बच्चो! इस वृक्षके पास भूमिमें यह चूहेका बिल है। तुमलोग जल्दी-से-जल्दी इसके भीतर घुस जाओ। इसके भीतर तुम्हें आगसे भय नहीं है ।। १६ ।।
ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः।
एवं प्रतिकृतं मन्ये ज्वलतः कृष्णवर्त्मनः ।। १७ ।।
तुमलोगोंके घुस जानेपर मैं इस बिलका छेद धूलसे बंद कर दूँगी। बच्चो! मेरा विश्वास है, ऐसा करनेसे इस जलती आगसे तुम्हारा बचाव हो सकेगा ।। १७ ।।
तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहन्तुं पांसुसंचयम्।
रोचतामेष वो वादो मोक्षार्थं च हुताशनात् ।। १८ ।।
फिर आग बुझ जानेपर मैं धूल हटानेके लिये यहाँ आ जाऊँगी। आगसे बचनेके लिये मेरी यह बात तुमलोगोंको पसंद आनी चाहिये ।। १८ ।।
शार्ङ्गका ऊचुः
अबर्हान् मांसभूतान् नः क्रव्यादाखुर्विनाशयेत्।
पश्यमाना भयमिदं प्रवेष्टुं नात्र शक्नुमः ।। १९ ।।
**शार्ङ्गक बोले—**अभी हम बिना पंखोंके बच्चे हैं, हमारा शरीर मांसका लोथड़ामात्र है। चूहा मांसभक्षी जीव है, वह हमें नष्ट कर देगा। इस भयको देखते हुए हम इस बिलमें प्रवेश नहीं कर सकते ।। १९ ।।
कथमग्निर्न नो धक्ष्येत् कथमाखुर्न नाशयेत्।
कथं न स्यात् पिता मोघः कथं माता ध्रियेत नः ।। २० ।।
हम तो यह सोचते हैं कि क्या उपाय हो, जिससे अग्नि हमें न जलावे, चूहा हमें न मारे एवं हमारे पिताका संतानोत्पादनविषयक प्रयत्न निष्फल न हो और हमारी माता भी जीवित रहे? ॥ २० ॥
बिल आखोर्विनाशः स्यादग्नेराकाशचारिणाम् ।
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं श्रेयान् दाहो न भक्षणम् ॥ २१ ॥
बिलमें चूहेसे हमारा विनाश हो जायगा और आकाशमें उड़नेपर अग्निसे। इन दोनों परिणामोंपर विचार करनेसे हमें आगसे जल जाना ही श्रेष्ठ जान पड़ता है, चूहेका भोजन बनना नहीं ॥ २१ ॥
गर्हितं मरणं नः स्यादाखुना भक्षिते बिले ।
शिष्टादिष्टः परित्यागः शरीरस्य हुताशनात् ॥ २२ ॥
यदि हमलोगोंको बिलमें चूहेने खा लिया तो वह हमारी निन्दित मृत्यु होगी। आगसे जलकर शरीरका परित्याग करनेके लिये शिष्ट पुरुषोंकी आज्ञा है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि जरिताविलापे
एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें जरिताविलापविषयक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
जरितोवाच
अस्माद् बिलान्निष्पतितमाखुं श्येनो जहार तम् ।
क्षुद्रं पद्ध्यां गृहीत्वा च यातो नात्र भयं हि वः ॥ १ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! चूहा इस बिलसे निकला था, उस समय उसे बाज उठा ले गया; उस छोटेसे चूहेको वह अपने दोनों पंजोंसे पकड़कर उड़ गया। अतः अब इस बिलमें तुम्हारे लिये भय नहीं है ॥ १ ॥
शाङ्गँका ऊचुः
न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥ २ ॥
शाङ्गँक बोले— हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहेको उठा ले गया। उस बिलमें दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है ॥ २ ॥
संशयो वह्निरागच्छेदृ दृष्टं वायोर्निवर्तनम् ।
मृत्युर्नो बिलवासिभ्यो बिले स्यान्नात्र संशयः ॥ ३ ॥
आग यहाँतक आयेगी, इसमें संदेह है; क्योंकि वायुके वेगसे अग्निका दूसरी ओर पलट जाना भी देखा गया है। परंतु बिलमें तो उसके भीतर रहनेवाले जीवोंसे हमारी मृत्यु होनेमें कोई संशय ही नहीं है ॥ ३ ॥
निःसंशयात् संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते ।
चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ ४ ॥
माँ! संशयरहित मृत्युसे संशययुक्त मृत्यु अच्छी है (क्योंकि उसमें बच जानेकी भी आशा होती है); अतः तुम आकाशमें उड़ जाओ। तुम्हें फिर (धर्मानुकूल रीतिसे) सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४ ॥
जरितोवाच
अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पततां वरम् ।
बिलादाखुं समादाय श्येनं पुत्रा महाबलम् ॥ ५ ॥
तं पतन्तं महावेगात् त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् ।
आशिषोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूषिकं बिलात् ॥ ६ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! जब पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली बाज बिलसे चूहेको लेकर वेगपूर्वक उड़ा जा रहा था, उस समय महान् वेगसे उड़नेवाले उस बाजके पीछे मैं भी बड़ी
तीव्र गतिसे गयी और बिलसे चूहेको ले जानेके कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली — ॥ ५-६ ॥
यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि । भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥ ‘श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय’ ॥ ७ ॥
स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्त्रिणा । तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥ ८ ॥ जब उस पक्षिप्रवर बाजने चूहेको खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी ॥ ८ ॥
प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् । श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥ ९ ॥ अतः बच्चो! तुमलोग विश्वासपूर्वक बिलमें घुसो। वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है। महान् बाजने मेरी आँखोंके सामने ही चूहेका अपहरण किया था ॥ ९ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन । अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! बाजने चूहेको पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिलमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १० ॥
जरितोवाच
अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् । नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥ जरिताने कहा—बेटो! मैं जानती हूँ, बाजने अवश्य चूहेको पकड़ लिया। तुमलोग मेरी बात मानो। इस बिलमें तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ११ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः । समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥ १२ ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भयसे छुड़ानेकी चेष्टा न करो। संदिग्ध कार्योंमें प्रवृत्त होना बुद्धिमानीका काम नहीं है ॥ १२ ॥
न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान् वेत्थ ये वयम् । पीड्यमाना बिभर्ष्यास्मान् का सती के वयं तव ॥ १३ ॥
हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है और हम पहले कौन थे, इस बातको भी तुम नहीं जानतीं। फिर तुम क्यों कष्ट सहकर हमारी रक्षा करना चाहती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं? ।। १३ ।।
तरुणी दर्शनीयासि समर्था भर्तुरिषणे ।
अनुगच्छ पतिं मात: पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ।। १४ ।।
माँ! अभी तुम्हारी तरुण अवस्था है, तुम दर्शनीय सुन्दरी हो और पतिके अन्वेषणमें समर्थ भी हो। अतः पतिका ही अनुसरण करो। तुम्हें फिर सुन्दर पुत्र मिल जायँगे ।। १४ ।।
वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् ।
अथास्मान् न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ।। १५ ।।
हम आगमें जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्निने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता ततः शार्ङ्गी पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे ।
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बच्चोंके ऐसा कहनेपर शार्ङ्गी उन्हें खाण्डववनमें छोड़कर तुरंत ऐसे स्थानमें चली गयी, जहाँ आगसे कुशलपूर्वक बिना किसी कष्टके बच जानेकी सम्भावना थी ।। १६ ।।
ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात् त्वरितो हव्यवाहनः ।
यत्र शार्ङ्गा बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ।। १७ ।।
तदनन्तर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव तुरंत वहाँ आ पहुँचे, जहाँ मन्दपालके पुत्र शार्ङ्गक पक्षी मौजूद थे ।। १७ ।।
ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहंगमाः ।
जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ।। १८ ।।
तब उस जलती हुई आगको देखकर वे पक्षी आपसमें वार्तालाप करने लगे। उनमेंसे जरितारिने अग्निदेवको यह बात सुनायी ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २३० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३० ।।
२३१-
एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना
जरितारिरुवाच
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पूरुषः ।
स कृच्छ्रकालं सम्प्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित् ॥ १ ॥
जरितारि बोला— बुद्धिमान् पुरुष संकटकाल आनेके पहले ही सजग हो जाता है, वह संकटका समय आ जानेपर कभी व्यथित नहीं होता ॥ १ ॥
यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते ।
स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत् ॥ २ ॥
जो मूढ़चित्त जीव आनेवाले संकटको नहीं जानता, वह संकटके समय व्यथित होनेके कारण महान् कल्याणसे वंचित रह जाता है ॥ २ ॥
सारिसृक्क उवाच
धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः ।
प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः ॥ ३ ॥
सारिसृक्कने कहा— भैया! तुम धीर और बुद्धिमान् हो और हमारे लिये यह प्राणसंकटका समय है (अतः इससे तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो); क्योंकि बहुतोंमें कोई एक ही बुद्धिमान् और शूरवीर होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥
स्तम्बमित्र उवाच
ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः ।
ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति कनीयान् किं करिष्यति ॥ ४ ॥
स्तम्बमित्र बोला— बड़ा भाई पिताके तुल्य है, बड़ा भाई ही संकटसे छुड़ाता है। यदि बड़ा भाई ही आनेवाले भय और उससे बचनेके उपायको न जाने तो छोटा भाई क्या करेगा? ॥ ४ ॥
द्रोण उवाच
हिरण्यरेतास्त्वरितो ज्वलन्नायाति नः क्षयम् ।
सप्तजिह्वाननः क्रूरो लेलिहानो विसर्पति ॥ ५ ॥
द्रोणने कहा— यह जाज्वल्यमान अग्नि हमारे घोंसलेकी ओर तीव्र वेगसे आ रहा है। इसके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं और यह क्रूर अग्नि समस्त वृक्षोंको चाटता हुआ सब ओर
फैल रहा है ।। ५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः । तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव ।। ६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार आपसमें बातें करके मन्दपालके वे पुत्र एकाग्रचित्त हो अग्निदेवकी स्तुति करने लगे; वह स्तुति सुनो ।। ६ ।।
जरितारिरुवाच
आत्मासि वायोज्र्वलन शरीरमसि वीरुधाम् । योनिरपश्च ते शुक्लं योनिस्त्वमसि चाम्भसः ।। ७ ।। **जरितारिने कहा—**अग्निदेव! आप वायुके आत्मस्वरूप और वनस्पतियोंके शरीर हैं। तृण-लता आदिकी योनि पृथ्वी और जल तुम्हारे वीर्य हैं, जलकी योनि भी तुम्हीं हो ।। ७ ।। ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा । अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा ।। ८ ।। महावीर्य! आपकी ज्वालाएँ सूर्यकी किरणोंके समान ऊपर-नीचे, आगे-पीछे तथा अगल-बगल सब ओर फैल रही हैं ।। ८ ।।
सारिसृक्क उवाच
माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः पक्षा जाता नैव नो धूमकेतो । न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने ।। ९ ।। **सारिसृक्क बोला—**धूममयी ध्वजासे सुशोभित अग्निदेव! हमारी माता चली गयी, पिताका भी हमें पता नहीं है और हमारे अभी पंखतक नहीं निकले हैं। हमारा आपके सिवा दूसरा कोई रक्षक नहीं है; अतः आप ही हम बालकोंकी रक्षा करें ।। ९ ।। यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । तेन नः परिपाहि त्वमार्त्तान् वै शरणैषिणः ।। १० ।। अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरणमें आनेकी इच्छावाले हम आर्त प्राणियोंकी रक्षा कीजिये ।। १० ।। त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव । ऋषीनस्मान् बालकान् पालयस्व परेणास्मान् प्रेहि वै हव्यवाह ।। ११ ।।
जातवेद! एकमात्र आप ही सर्वत्र तपते हैं। देव! सूर्यकी किरणोंमें तपनेवाला पुरुष भी आपसे भिन्न नहीं है। हव्यवाहन! हम बालक ऋषि हैं; हमारी रक्षा कीजिये। हमसे दूर चले जाइये ॥ ११ ॥
स्तम्बमित्र उवाच
सर्वमग्ने त्वमेवैकस्त्वयि सर्वमिदं जगत् । त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ १२ ॥ **स्तम्बमित्रने कहा—**अग्ने! एकमात्र आप ही सब कुछ हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है। आप ही प्राणियोंका पालन और जगत्को धारण करते हैं ॥ १२ ॥ त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः । मनीषिणस्त्वां जानन्ति बहुधा चैकधापि च ॥ १३ ॥ आप ही अग्नि, आप ही हव्यका वहन करनेवाले और आप ही उत्तम हविष्य हैं। मनीषी पुरुष आपको ही अनेक और एकरूपमें स्थित जानते हैं ॥ १३ ॥ सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह काले प्राप्ते पचसि पुनः समिद्धः । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥ १४ ॥ हव्यवाह! आप इन तीनों लोकोंकी सृष्टि करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार कर देते हैं। अतः अग्ने! आप सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही इसके लयस्थान भी हैं ॥ १४ ॥
द्रोण उवाच
त्वमन्नं प्राणिभिर्भुक्तमन्तर्भूतो जगत्पते । नित्यप्रवृद्धः पचसि त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ **द्रोण बोला—**जगत्पते! आप ही शरीरके भीतर रहकर प्राणियोंद्वारा खाये हुए अन्नको सदा उद्दीप्त होकर पचाते हैं। सम्पूर्ण विश्व आपमें ही प्रतिष्ठित है ॥ १५ ॥ सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो भूमेरम्भो भूमिजातान् रसांश्च । विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले दृष्ट्वा वृष्ट्या भावयसीह शुक्ल ॥ १६ ॥ शुक्लवर्णवाले सर्वज्ञ अग्निदेव! आप ही सूर्य होकर अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीसे जलको और सम्पूर्ण पार्थिव रसोंको ग्रहण करते हैं तथा पुनः समय आनेपर आवश्यकता देखकर वर्षाके द्वारा इस पृथ्वीपर जलरूपमें उन सब रसोंको प्रस्तुत कर देते हैं ॥ १६ ॥ त्वत्त एताः पुनः शुक्ल वीरुधो हरितच्छदाः ।
जायन्ते पुष्करिण्यश्च सुभद्रश्च महोदधिः ॥ १७ ॥
उज्ज्वलवर्णवाले अग्ने! फिर आपसे ही हरे-हरे पत्तोंवाले वनस्पति उत्पन्न होते हैं और आपसे ही पोखरियाँ तथा कल्याणमय महासागर पूर्ण होते हैं ॥ १७ ॥
इदं वै सद्म तिग्मांशो वरुणस्य परायणम् ।
शिवस्त्राता भवास्माकं मास्मानद्य विनाशय ॥ १८ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले अग्निदेव! हमारा यह शरीररूप घर रसनेन्द्रियाधिपति वरुणदेवका आलम्बन है। आप आज शीतल एवं कल्याणमय बनकर हमारे रक्षक होइये; हमें नष्ट न कीजिये ॥ १८ ॥
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन् हुताशन ।
परेण प्रेहि मुञ्चास्मान् सागरस्य गृवानिव ॥ १९ ॥
पिंगल नेत्र तथा लोहित ग्रीवावाले हुताशन! आप कृष्णवर्त्मा हैं। समुद्रतटवर्ती गृहोंकी भाँति हमें भी छोड़ दीजिये। दूरसे ही निकल जाइये ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना ।
द्रोणमाह प्रतीतात्मा मन्दपालप्रतिज्ञया ॥ २० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ब्रह्मवादी द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना की जानेपर प्रसन्नचित्त हुए अग्निने मन्दपालसे की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण करके द्रोणसे कहा ॥ २० ॥
अग्निरुवाच
ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्म तद् व्याहृतं त्वया ।
ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते विद्यते भयम् ॥ २१ ॥
**अग्नि बोले—**जान पड़ता है, तुम द्रोण ऋषि हो; क्योंकि तुमने उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। मैं तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँगा, तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ २१ ॥
मन्दपालेन वै यूयं मम पूर्वं निवेदिताः ।
वर्ज्येः पुत्रकान् मह्यं दहन् दावमिति स्म ह ॥ २२ ॥
मन्दपाल मुनिने पहले ही मुझसे तुमलोगोंके विषयमें निवेदन किया था कि 'आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दीजियेगा' ॥ २२ ॥
तस्य तद् वचनं द्रोण त्वया यच्चेह भाषितम् ।
उभयं मे गरीयस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ।
भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते ब्रह्मन् स्तोत्रेण सत्तम ॥ २३ ॥
द्रोण! तुम्हारे पिताका यह वचन और तुमने यहाँ जो कुछ कहा है, वह भी मेरे लिये गौरवकी वस्तु है। बोलो, तुम्हारी और कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ? ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे!
तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे इस स्तोत्रसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ २३॥
द्रोण उवाच
इमे मार्जारिकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः। एतान् कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान्॥ २४॥
**द्रोणने कहा—**शुक्लस्वरूप अग्ने! ये बिलाव हमें प्रतिदिन उद्विग्न करते रहते हैं। हुताशन! आप इन्हें बन्धु-बान्धवोंसहित भस्म कर डालिये॥ २४॥
वैशम्पायन उवाच
तथा तत् कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शार्ङ्गकान्। ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय॥ २५॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शार्ङ्गकोंकी अनुमतिसे अग्निदेवने वैसा ही किया और प्रज्वलित होकर वे सम्पूर्ण खाण्डववनको जलाने लगे॥ २५॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३१॥