भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1573

पितरों और देवताओंके लोकमें भी खाण्डववनके दाहकी गर्मी पहुँचने लगी। बहुतेरे प्राणियोंके समुदाय कातर हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ।। ३१ ।।
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ।
तेन शब्देन वित्र्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ।। ३२ ।।
हाथी, मृग और चीते भी रोदन करते थे। उनके आर्तनादसे गङ्गा तथा समुद्रके भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे ।। ३२ ।।
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः ।
न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ।। ३३ ।।
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद् योद्धुं कुतः पुनः ।
उस वनमें रहनेवाले जो विद्याधर-जातिके लोग थे, उनकी भी यही दशा थी। महाबाहो! उस समय कोई श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ।। ३४ ।।
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान् हरिः ।
जो कोई राक्षस, दानव और नाग वहाँ एक साथ संघ बनाकर निकलते थे, उन सबको भगवान् श्रीहरि चक्रद्वारा मार देते थे ।। ३४ १/२ ।।
ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद् गतासवः ।। ३५ ।।
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि ।
वे तथा दूसरे विशालकाय प्राणी चक्रके वेगसे शरीर और मस्तक छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण निर्जीव हो प्रज्वलित आगमें गिर पड़ते थे ।। ३५ १/२ ।।
स मांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ।। ३६ ।।
उपर्य्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।
दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च सम्प्रदीप्तमहाननः ।। ३७ ।।
इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये। उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्वामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा ।। ३६-३७ ।।
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन् प्राणभृतां वसाम् ।
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ।। ३८ ।।
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः ।
उनके चमकीले केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे, आँखें पिंगलवर्णकी थीं और वे प्राणियोंके मेदेका रस पी रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गये। उन्हें बड़ी शान्ति मिली ।। ३८ १/२ ।।
तथासुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ।। ३९ ।।