महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1615, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिहिता भावयाम्येवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णबिन्दुभिश्चित्रा गुर्वी भारसहा दृढा ॥ ६ ॥ 'मैं समझता हूँ, राजा वृषपर्वाने युद्धमें शत्रुओंका संहार करके वह गदा वहीं रख दी थी। वह गदा बड़ी भारी है, विशेष भार या आघात सहन करनेमें समर्थ एवं सुदृढ़ है। उसमें सोनेकी फूलियाँ लगी हुई हैं, जिनसे वह बड़ी विचित्र दिखायी देती है ॥ ६ ॥ सा वै शतसहस्रस्य सम्मिता शत्रुघातिनी । अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा ॥ ७ ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाली वह गदा अकेली ही एक लाख गदाओंके बराबर है। जैसे गाण्डीव धनुष आपके योग्य है, वैसे ही वह गदा भीमसेनके योग्य होगी ॥ ७ ॥ वारुणश्च महाशङ्खो देवदत्तः सुघोषवान् । सर्वमेतत् प्रदास्यामि भवते नात्र संशयः ॥ ८ ॥ 'वहाँ वरुणदेवका देवदत्त नामक महान् शंख भी है, जो बड़ी भारी आवाज करनेवाला है। ये सब वस्तुएँ लाकर मैं आपको भेंट करूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ८ ॥ इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थ प्रागुदीचीं दिशं गतः । अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वत प्रति ॥ ९ ॥ अर्जुनसे ऐसा कहकर मयासुर पूर्वोत्तर दिशा (ईशानकोण)-में कैलाससे उत्तर मैनाक पर्वतके पास गया ॥ ९ ॥ हिरण्यशृङ्गः सुमहान् महामणिमयो गिरिः । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥ १० ॥ द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । 'वहीं हिरण्यशृंग नामक महामणिमय विशाल पर्वत है, जहाँ रमणीय बिन्दुसर नामक तीर्थ है। वहीं राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोंतक (तपस्या करते हुए) निवास किया था ॥ १० १/२ ॥ यत्रेष्टं सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना ॥ ११ ॥ आहृताः क्रतवो मुख्याः शतं भरतसत्तम । यत्र यूपा मणिमयाश्चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे ॥ ११-१२ ॥ शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः । अत्रेष्ट्वा स गतः सिद्धिं सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १३ ॥ यह सब शोभाके लिये बनाया गया था, शास्त्रीय विधि अथवा सिद्धान्तके अनुसार नहीं। सहस्र नेत्रोंवाले शचीपति इन्द्रने भी वहीं यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की थी ॥ १३ ॥ यत्र भूतपतिः सृष्ट्वा सर्वान् लोकान् सनातनः ।