महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1616, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपास्यते तिग्मतेजाः स्थितो भूतैः सहस्रशः ॥ १४ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त प्राणियोंके अधिपति उग्रतेजस्वी सनातन देवता महादेवजी वहीं रहकर सहस्रों भूतोंसे सेवित होते हैं ॥ १४ ॥ नरनारायणौ ब्रह्मा यमः स्थाणुश्च पञ्चमः । उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥ १५ ॥ एक हजार युग बीतनेपर वहीं नर-नारायण ऋषि, ब्रह्मा, यमराज और पाँचवें महादेवजी यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ १५ ॥ यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षगणान् बहून् । श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये ॥ १६ ॥ यह वही स्थान है, जहाँ भगवान् वासुदेवने धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोंतक निरंतर श्रद्धापूर्वक यज्ञ किया था ॥ १६ ॥ सुवर्णमालिनो यूपाश्चैत्याश्चाप्यतिभास्वराः । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशवः ॥ १७ ॥ उस यज्ञमें स्वर्णमालाओंसे मण्डित खंभे और अत्यन्त चमकीली वेदियाँ बनी थीं। भगवान् केशवने उस यज्ञमें सहस्रों-लाखों वस्तुएँ दानमें दी थीं ॥ १७ ॥ तत्र गत्वा स जग्राह गदां शङ्खं च भारत । स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद् वृषपर्वणः ॥ १८ ॥ भारत! तदनन्तर मयासुरने वहाँ जाकर वह गदा, शंख और सभाभवन बनानेके लिये स्फटिक मणिमय द्रव्य ले लिया, जो पहले वृषपर्वाके अधिकारमें था ॥ १८ ॥ किंकरैः सह रक्षोभिर्यदरक्षन्महद् धनम् । तद्गृह्णान्मयस्तत्र गत्वा सर्वं महासुरः ॥ १९ ॥ बहुत-से किंकर तथा राक्षस जिस महान् धनकी रक्षा करते थे, वहाँ जाकर महान् असुर मयने वह सब ले लिया ॥ १९ ॥ तदाहृत्य च तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम् ॥ २० ॥ वे सब वस्तुएँ लाकर उस असुरने वह अनुपम सभाभवन तैयार की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात, दिव्य, मणिमयी और शुभ एवं सुन्दर थी ॥ २० ॥ गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा । देवदत्तं चार्जुनाय शङ्खप्रवरमुत्तमम् ॥ २१ ॥ उसने उस समय वह श्रेष्ठ गदा भीमसेनको और देवदत्त नामक उत्तम शंख अर्जुनको भेंट कर दिया ॥ २१ ॥ यस्य शङ्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे । सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा ॥ २२ ॥