भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय दुरात्मने ॥ १७८ ॥ इतना कहकर उत्तंक फिर बोले—भूपालशिरोमणे! नागराज तक्षकने आपके पिताकी हत्या की है; अतः आप उस दुरात्मा सर्पसे इसका बदला लीजिये ॥ १७८ ॥

कार्यकालं हि मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः । तद्गच्छापचितिं राजन् पितुस्तस्य महात्मनः ॥ १७९ ॥ मैं समझता हूँ, शत्रुनाशन-कार्यकी सिद्धिके लिये जो सर्पयज्ञरूप कर्म शास्त्रमें देखा गया है, उसके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ है। अतः राजन्! अपने महात्मा पिताकी मृत्युका बदला आप अवश्य लें ॥ १७९ ॥

तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना । पञ्चत्वमगमद् राजा वज्राहत इव द्रुमः ॥ १८० ॥ यद्यपि आपके पिता महाराज परीक्षित्‌ने कोई अपराध नहीं किया था तो भी उस दुष्टात्मा सर्पने उन्हें डँस लिया और वे वज्रके मारे हुए वृक्षकी भाँति तुरंत ही गिरकर कालके गालमें चले गये ॥ १८० ॥

बलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः । अकार्यं कृतवान् पापो योऽदशत् पितरं तव ॥ १८१ ॥ सर्पोंमें अधम तक्षक अपने बलके घमण्डसे उन्मत्त रहता है। उस पापीने यह बड़ा भारी अनुचित कर्म किया जो आपके पिताको डँस लिया ॥ १८१ ॥

राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् । यियासुं काश्यपं चैव न्यवर्तयत पापकृत् ॥ १८२ ॥ वे महाराज परीक्षित् राजर्षियोंके वंशकी रक्षा करनेवाले और देवताओंके समान तेजस्वी थे, काश्यप नामक एक ब्राह्मण आपके पिताकी रक्षा करनेके लिये उनके पास आना चाहते थे, किंतु उस पापाचारीने उन्हें लौटा दिया ॥ १८२ ॥

होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने । सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद् विधीयताम् ॥ १८३ ॥ अतः महाराज! आप सर्पयज्ञका अनुष्ठान करके उसकी प्रज्वलित अग्निमें उस पापीको होम दीजिये; और जल्दी-से-जल्दी यह कार्य कर डालिये ॥ १८३ ॥

एवं पितुश्चापचितिं कृत्वांस्त्वं भविष्यसि । मम प्रियं च सुमहत् कृतं राजन् भविष्यति ॥ १८४ ॥ कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना । विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ॥ १८५ ॥ ऐसा करके आप अपने पिताकी मृत्युका बदला चुका सकेंगे एवं मेरा भी अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा। समूची पृथ्वीका पालन करनेवाले नरेश! तक्षक बड़ा दुरात्मा है।