महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपापरहित महाराज! मैं गुरुजीके लिये एक कार्य करने जा रहा था, जिसमें उस दुष्टने बहुत बड़ा विघ्न डाल दिया था ।। १८४-१८५ ।।
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह ।
उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा ।। १८६ ।।
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**महर्षियो! यह समाचार सुनकर राजा जनमेजय तक्षकपर कुपित हो उठे। उत्तंकके वाक्यने उनकी क्रोधाग्निमें घीका काम किया। जैसे घीकी आहुति पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वे क्रोधसे अत्यन्त कुपित हो गये ।। १८६ ।।
अपृच्छत् स तदा राजा मन्त्रिणस्तान् सुदुःखितः ।
उत्तङ्कस्यैव सांनिध्ये पितुः स्वर्गगतिं प्रति ।। १८७ ।।
उस समय राजा जनमेजयने अत्यन्त दुःखी होकर उत्तंकके निकट ही मन्त्रियोंसे पिताके स्वर्गगमनका समाचार पूछा ।। १८७ ।।
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् ।
यदैव वृत्तं पितरमुत्तङ्कादशृणोत् तदा ।। १८८ ।।
उत्तंकके मुखसे जिस समय उन्होंने पिताके मरनेकी बात सुनी, उसी समय वे महाराज दुःख और शोकमें डूब गये ।। १८८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौष्यपर्वणि तृतीयोऽध्यायः ।। ३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पौष्यपर्वमें (पौष्याख्यानविषयक) तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।