महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहान् कल्याण कर सकता है ।। ३५ ।। कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकैः । यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः ।। ३६ ।। क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी और धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं? ।। ३६ ।। एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ।। ३७ ।। यदि एक भी मन्त्री मेधावी, शौर्यसम्पन्न, संयमी और चतुर हो तो राजा अथवा राजकुमारको विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति करा देता है ।। ३७ ।। कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च । त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ।। ३८ ।। क्या तुम शत्रुपक्षके अठारह³ और अपने पक्षके पंद्रह³ तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो? ।। ३८ ।। कच्चिद् द्विषामविदितः प्रतिपन्नश्च सर्वदा । नित्ययुक्तो रिपून् सर्वान् वीक्षसे रिपुसूदन ।। ३९ ।। शत्रुसूदन! तुम शत्रुओंसे अज्ञात, सतत सावधान और नित्य प्रयत्नशील रहकर अपने सम्पूर्ण शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखते हो न? ।। ३९ ।। कच्चिद् विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः । अनसूयुरनुप्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः ।। ४० ।। क्या तुम्हारे पुरोहित विनयशील, कुलीन, बहुज्ञ, विद्वान्, दोषदृष्टिसे रहित तथा शास्त्रचर्चामें कुशल हैं? क्या तुम उनका पूर्ण सत्कार करते हो? ।। ४० ।। कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः । हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा ।। ४१ ।। तुमने अग्निहोत्रके लिये विधिज्ञ, बुद्धिमान् और सरल स्वभावके ब्राह्मणको नियुक्त किया है न? वह सदा किये हुए और किये जानेवाले हवनको तुम्हें ठीक समयपर सूचित कर देता है न? ।। ४१ ।। कच्चिदङ्गेषु निष्णातो ज्योतिषः प्रतिपादकः । उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञः कुशलस्तव ।। ४२ ।। क्या तुम्हारे यहाँ हस्त-पादादि अंगोंकी परीक्षामें निपुण, ग्रहोंकी वक्र तथा अतिचार आदि गतियों एवं उनके शुभाशुभ परिणाम आदिको बतानेवाला तथा दिव्य, भौम एवं शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके उत्पातोंको पहलेसे ही जान लेनेमें कुशल ज्योतिषी है? ।। ४२ ।। कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः ।