भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1635

जघन्याश्च जघन्येषु भृत्याः कर्मसु योजिताः ॥ ४३ ॥ तुमने प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंको उनके योग्य महान् कार्योंमें, मध्यम श्रेणीके कार्यकर्ताओंको मध्यम कार्योंमें तथा निम्न श्रेणीके सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुसार छोटे कामोंमें ही लगा रखा है न? ॥ ४३ ॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहाञ्छुचीन् । श्रेष्ठाञ्छ्रेष्ठेषु कच्चित् त्वं नियोजयसि कर्मसु ॥ ४४ ॥ क्या तुम निश्छल, बाप-दादोंके क्रमसे चले आये हुए और पवित्र आचार-विचारवाले श्रेष्ठ मन्त्रियोंको सदा श्रेष्ठ कर्मोंमें लगाये रखते हो? ॥ ४४ ॥

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्विजसे प्रजाः । राष्ट्रं तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ ॥ ४५ ॥ भरतश्रेष्ठ! कठोर दण्डके द्वारा तुम प्रजाजनोंको अत्यन्त उद्वेगमें तो नहीं डाल देते? मन्त्रीलोग तुम्हारे राज्यका न्यायपूर्वक पालन करते हैं न? ॥ ४५ ॥

कच्चित् त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा । उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः ॥ ४६ ॥ जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका और स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरतापूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती? ॥ ४६ ॥

कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान् धृतिमाञ्छुचिः । कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिस्तथा ॥ ४७ ॥ क्या तुम्हारा सेनापति हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न, शूरवीर, बुद्धिमान्, धैर्यवान्, पवित्र, कुलीन, स्वामिभक्त तथा अपने कार्यमें कुशल है? ॥ ४७ ॥

कच्चिद् बलस्य ते मुख्याः सर्वयुद्धविशारदाः । धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः ॥ ४८ ॥ तुम्हारी सेनाके मुख्य-मुख्य दलपति सब प्रकारके युद्धोंमें चतुर, धृष्ट (निर्भय), निष्कपट और पराक्रमी हैं न? तुम उनका यथोचित सत्कार एवं सम्मान करते हो न? ॥ ४८ ॥

कच्चिद् बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम् । सम्प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकर्षसि ॥ ४९ ॥ अपनी सेनाके लिये यथोचित भोजन और वेतन ठीक समयपर दे देते हो न? जो उन्हें दिया जाना चाहिये, उसमें कमी या विलम्ब तो नहीं कर देते? ॥ ४९ ॥

कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयोर्भृताः । भर्तुः कुप्यन्ति यद्भृत्याः सोऽनर्थः सुमहान् स्मृतः ॥ ५० ॥