भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1637

समश्न्रानभिशङ्क्यश्च यथा माता यथा पिता ॥ ५७ ॥ पृथ्वीपते! क्या समस्त भूमण्डलकी प्रजा तुम्हें ही समदर्शी एवं माता-पिताके समान विश्वसनीय मानती है? ॥ ५७ ॥ कच्चिद् व्यसनिनं शत्रुं निशम्य भरतर्षभ । अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम् ॥ ५८ ॥ भरतकुलभूषण! क्या तुम अपने शत्रुको (स्त्री-द्यूत आदि) दुर्व्यसनोंमें फँसा हुआ सुनकर उसके त्रिविध बल (मन्त्र, कोष एवं भृत्य-बल अथवा प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति एवं उत्साहशक्ति)-पर विचार करके यदि वह दुर्बल हो तो उसके ऊपर बड़े वेगसे आक्रमण कर देते हो? ॥ ५८ ॥ यात्रामारभसे दिष्ट्या प्राप्तकालमरिंदम । पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम् । बलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रतः ॥ ५९ ॥ शत्रुदमन! क्या तुम पार्ष्णिग्राह आदि बारह* व्यक्तियोंके मण्डल (समुदाय)-को जानकर अपने कर्तव्यका³ निश्चय करके और पराजयमूलक व्यसनोंका³ अपने पक्षमें अभाव तथा शत्रुपक्षमें आधिक्य देखकर उचित अवसर आनेपर दैवका भरोसा करके अपने सैनिकोंको अग्रिम वेतन देकर शत्रुपर चढ़ाई कर देते हो? ॥ ५९ ॥ कच्चिच्च बलमुख्येभ्यः परराष्ट्रे परंतप । उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथार्हतः ॥ ६० ॥ परंतप! शत्रुके राज्यमें जो प्रधान-प्रधान योद्धा हैं, उन्हें छिपे-छिपे यथायोग्य रत्न आदि भेंट करते रहते हो या नहीं? ॥ ६० ॥ कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रियः । परान् जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान् ॥ ६१ ॥ कुन्तीनन्दन! क्या तुम पहले अपनी इन्द्रियों और मनको जीतकर ही प्रमादमें पड़े हुए अजितेन्द्रिय शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करते हो? ॥ ६१ ॥ कच्चित् ते यास्यतः शत्रून् पूर्वं यान्ति स्वनुष्ठिताः । साम दानं च भेदश्च दण्डश्च विधिवद् गुणाः ॥ ६२ ॥ शत्रुओंपर तुम्हारे आक्रमण करनेसे पहले अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए तुम्हारे साम, दान, भेद और दण्ड—ये चार गुण विधिपूर्वक उन शत्रुओं तक पहुँच जाते हैं न? (क्योंकि शत्रुओंको वशमें करनेके लिये इनका प्रयोग आवश्यक है।) ॥ ६२ ॥ कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा परान् यासि विशाम्पते ।