महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1638, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतांश्च विक्रमेसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि ॥ ६३ ॥ महाराज! तुम अपने राज्यकी नींवको दृढ़ करके शत्रुओंपर धावा करते हो न? उन शत्रुओंको जीतनेके लिये पूरा पराक्रम प्रकट करते हो न? और उन्हें जीतकर उनकी पूर्णरूपसे रक्षा तो करते रहते हो न? ॥ ६३ ॥
कच्चिदष्टाङ्गसंयुक्ता चतुर्विधबला चमूः । बलमुख्यैः सुनीता ते द्विषतां प्रतिवर्धिनी ॥ ६४ ॥ क्या धनरक्षक, द्रव्यसंग्राहक, चिकित्सक, गुप्तचर, पाचक, सेवक, लेखक और प्रहरी—इन आठ अंगों और हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल—इन चार³ प्रकारके बलोंसे युक्त तुम्हारी सेना सुयोग्य सेनापतियोंद्वारा अच्छी तरह संचालित होकर शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ होती है? ॥
कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परंतप । अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून् ॥ ६५ ॥ शत्रुओंको संतप्त करनेवाले महाराज! तुम शत्रुओंके राज्यमें अनाज काटने और दुर्भिक्षके समयकी उपेक्षा न करके रणभूमिमें शत्रुओंको मारते हो न? ॥ ६५ ॥
कच्चित् स्वपरराष्ट्रेषु बहवोऽधिकृतास्तव । अर्थान् समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम् ॥ ६६ ॥ क्या अपने और शत्रुके राष्ट्रोंमें तुम्हारे बहुत-से अधिकारी स्थान-स्थानमें घूम-फिरकर प्रजाको वशमें करने एवं कर लेने आदि प्रयोजनोंको सिद्ध करते हैं और परस्पर मिलकर राष्ट्र एवं अपने पक्षके लोगोंकी रक्षामें लगे रहते हैं? ॥ ६६ ॥
कच्चिदभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च । घ्रेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव ॥ ६७ ॥ महाराज! तुम्हारे खाद्य पदार्थ, शरीरमें धारण करनेके वस्त्र आदि तथा सूँघनेके उपयोगमें आनेवाले सुगन्धित द्रव्योंकी रक्षा विश्वस्त पुरुष ही करते हैं न? ॥ ६७ ॥
कच्चित् कोषश्च कोष्ठं च वाहनं द्वारमायुधम् । आयश्च कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुष्ठितः ॥ ६८ ॥ तुम्हारे कल्याणके लिये सदा प्रयत्नशील रहनेवाले, स्वामिभक्त मनुष्योंद्वारा ही तुम्हारे धन-भण्डार, अन्न-भण्डार, वाहन, प्रधान द्वार, अस्त्र-शस्त्र तथा आयके साधनोंकी रक्षा एवं देख-भाल की जाती है न? ॥ ६८ ॥
कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च बाह्येभ्यश्च विशाम्पते । रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ॥ ६९ ॥