भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1642

भलीभाँति परीक्षा करके ही व्यवहार करते हो न? ।। ८९ ।। कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा । मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थपकर्षसि ।। ९० ।। कुन्तीकुमार! क्या तुम ओषधिसेवन या पथ्य-भोजन आदि नियमोंके पालनद्वारा अपने शारीरिक कष्टको तथा वृद्ध पुरुषोंकी सेवारूप सत्संगद्वारा मानसिक संतापको सदा दूर करते रहते हो? ।। ९० ।। कच्चिद् वैद्याश्चिकित्सायामष्टाङ्गायां विशारदाः । सुहृदश्चानुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ।। ९१ ।। तुम्हारे वैद्य अष्टांगचिकित्सामें ३ कुशल, हितैषी, प्रेमी एवं तुम्हारे शरीरको स्वस्थ रखनेके प्रयत्नमें सदा संलग्न रहनेवाले हैं न? ।। ९१ ।। कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा मानाद् वापि विशाम्पते । अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तान् न पश्यसि कथंचन ।। ९२ ।। नरेश्वर! कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम अपने यहाँ आये हुए अर्थी (याचक) और प्रत्यर्थी (राजाकी ओरसे मिली हुई वृत्ति बंद हो जानेसे दुःखी हो पुनः उसीको पानेके लिये प्रार्थी)-की ओर लोभ, मोह अथवा अभिमानवश किसी प्रकार आँख उठाकर देखतेतक नहीं? ।। ९२ ।। कच्चिन्न लोभान्मोहाद् वा विश्रम्भात् प्रणयेन वा । आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै ।। ९३ ।। कहीं अपने आश्रितजनोंकी जीविकावृत्तिको तुम लोभ, मोह, आत्मविश्वास अथवा आसक्तिसे बंद तो नहीं कर देते? ।। ९३ ।। कच्चित् पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिन । त्वया सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथंचन ।। ९४ ।। तुम्हारे नगर तथा राष्ट्रके निवासी मनुष्य संगठित होकर तुम्हारे साथ विरोध तो नहीं करते? शत्रुओंने उन्हें किसी तरह घूस देकर खरीद तो नहीं लिया है? ।। ९४ ।। कच्चिन्न दुर्बलः शत्रुुर्बलेन परिपीडितः । मन्त्रेण बलवान् कश्चिदुभाभ्यां च कथंचन ।। ९५ ।। कोई दुर्बल शत्रु जो तुम्हारे द्वारा पहले बलपूर्वक पीड़ित किया गया (किंतु मारा नहीं गया), अब मन्त्रणाशक्तिसे अथवा मन्त्रणा और सेना दोनों ही शक्तियोंसे किसी तरह बलवान् होकर सिर तो नहीं उठा रहा है? ।। ९५ ।। कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः । कच्चित् प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वयाऽऽदृताः ।। ९६ ।।