भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1643

क्या सभी मुख्य-मुख्य भूपाल तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे द्वारा सम्मान पाकर तुम्हारे लिये अपने प्राणोंकी बलि दे सकते हैं? ॥ ९६ ॥ कच्चित् ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते । ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदाः ॥ ९७ ॥ क्या तुम्हारे मनमें सभी विद्याओंके प्रति गुणके अनुसार आदरका भाव है? क्या तुम ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंकी सेवा-पूजा करते हो? जो तुम्हारे लिये शुभ एवं कल्याणकारिणी है। इन ब्राह्मणोंको तुम सदा दक्षिणा तो देते रहते हो न? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है ॥ ९७ ॥ कच्चिद् धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः । यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन् कर्मणि वर्तसे ॥ ९८ ॥ तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है? ॥ ९८ ॥ कच्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्नन्ति वै द्विजाः । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्षं सदक्षिणम् ॥ ९९ ॥ क्या तुम्हारे महलमें तुम्हारी आँखोंके सामने गुणवान् ब्राह्मण स्वादिष्ट और गुणकारक अन्न भोजन करते हैं? और भोजनके पश्चात् उन्हें दक्षिणा दी जाती है? ॥ ९९ ॥ कच्चित् क्रतूनकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वशः । पुण्डरीकांश्च कात्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ॥ १०० ॥ अपने मनको वशमें करके एकाग्रचित्त हो वाजपेय और पुण्डरीक आदि सभी यज्ञ-यागोंका तुम पूर्णरूपसे अनुष्ठान करनेका प्रयत्न तो करते हो न? ॥ १०० ॥ कच्चिज्ज्ञातीन् गुरून् वृद्धान् दैवतांस्तापसानपि । चैत्यांश्च वृक्षान् कल्याणान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥ १०१ ॥ जाति-भाई, गुरुजन, वृद्ध पुरुष, देवता, तपस्वी, चैत्यवृक्ष (पीपल) आदि तथा कल्याणकारी ब्राह्मणोंको नमस्कार तो करते हो न? ॥ १०१ ॥ कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेऽनघ । अपि मङ्गलहस्तश्च जनः पार्श्वे नु तिष्ठति ॥ १०२ ॥ निष्पाप नरेश! तुम किसीके मनमें शोक या क्रोध तो नहीं पैदा करते? तुम्हारे पास कोई मनुष्य हाथमें मंगलसामग्री लेकर सदा उपस्थित रहता है न? ॥ १०२ ॥