भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1644

कच्चिदेषा च ते बुद्धिवृत्तिरेषा च तेऽनघ । आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥ १०३ ॥ पापरहित युधिष्ठिर! अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति (विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है ॥ १०३ ॥

एतया वर्तमानस्य बुद्ध्या राष्ट्रं न सीदति । विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तसुखमेधते ॥ १०४ ॥ जो ऐसी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करता है, उसका राष्ट्र कभी संकटमें नहीं पड़ता। वह राजा सारी पृथ्वीको जीतकर बड़े सुखसे दिनोदिन उन्नति करता है ॥ १०४ ॥

कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारितश्चौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद् वध्यते शुचिः ॥ १०५ ॥ कहीं ऐसा तो नहीं होता कि शास्त्रकुशल विद्वानोंका संग न करनेवाले तुम्हारे मूर्ख मन्त्रियोंने किसी विशुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ एवं पवित्र पुरुषपर चोरीका अपराध लगाकर उसका सारा धन हड़प लिया हो? और फिर अधिक धनके लोभसे वे उसे प्राणदण्ड देते हों? ॥ १०५ ॥

दृष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ञैर्दृष्टः सकारणः । कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नर्षभ ॥ १०६ ॥ नरश्रेष्ठ! कोई ऐसा दुष्ट चोर जो चोरी करते समय गृहरक्षकोंद्वारा देख लिया गया और चोरीके मालसहित पकड़ लिया गया हो, धनके लोभसे छोड़ तो नहीं दिया जाता? ॥ १०६ ॥

उत्पन्नान् कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत । अर्थान् न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनैः ॥ १०७ ॥ भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते? ॥ १०७ ॥

नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् । अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् । एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् ॥ १०८ ॥ निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् । मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ॥ १०९ ॥