महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1668, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरयू, वारवत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य, ।। २२ ।।
लङ्घती गोमती चैव संध्या त्रिःस्रोतसी तथा ।
एताश्चान्याश्च राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुताः ।। २३ ।।
भरतवंशी राजेन्द्र युधिष्ठिर! लंघती, गोमती, संध्या और त्रिस्रोतसी, ये तथा दूसरे लोकविख्यात उत्तम तीर्थ (वहाँ वरुणकी उपासना करते हैं), ।। २३ ।।
सरितः सर्वतश्चान्यास्तीर्थानि च सरांसि च ।
कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर ।। २४ ।।
पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत ।
दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ।। २५ ।।
उपासते महात्मानं सर्वे जलचरास्तथा ।
समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने-अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। २४-२५ १/२ ।।
गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। २६ ।।
स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते ।
सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं ।। २६ १/२ ।।
महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिष्ठिताः ।। २७ ।।
कथयन्तः सुमधुराः कथास्तत्र समासते ।
रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस (मूर्तिमान् होकर) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं ।। २७ १/२ ।।
वारुणश्च तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते ।। २८ ।।
पुत्रपौत्रैः परिवृतो गोनाम्ना पुष्करेण च ।
वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र-पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्कर नामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है ।। २८ १/२ ।।
सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते ।। २९ ।।
ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं ।। २९ ।।
एषा मया सम्पत्तता वारुणी भरतर्षभ ।
दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शृणु ।। ३० ।।
भरतश्रेष्ठ! पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है। अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो ।। ३० ।।