महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1671, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं आभूषण धारण करनेवाले श्रीमान् राजा वैश्रवण (कुबेर) सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए बैठते हैं ।। ५-६ ।। मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन् । सौगन्धिकवनानां च गन्धं गन्धवहो वहन् ।। ७ ।। नलिन्याश्चालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंह्लादी वायुस्तमुपसेवते ।। ८ ।। (अपने पास आये हुए याचककी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करनेमें अत्यन्त) उदार मन्दार वृक्षोंके वनोंको आन्दोलित करता तथा सौगन्धिक कानन, अलका नामक पुष्करिणी और नन्दन वनकी सुगन्धका भार वहन करता हुआ हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाला गन्धवाही शीतल समीर उस सभामें कुबेरकी सेवा करता है ।। ७-८ ।। तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः । दिव्यतानैर्महाराज गायन्ति स्म सभागताः ।। ९ ।। महाराज! देवता और गन्धर्व अप्सराओंके साथ उस सभामें आकर दिव्य तानोंसे युक्त गीत गाते हैं ।। ९ ।। मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता । चारुनेत्रा घृताची च मेनका पुञ्जिकस्थला ।। १० ।। विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा । वर्गा च सौरभेयी च समीची बुद्बुदा लता ।। ११ ।। एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः । उपतिष्ठन्ति धनदं गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। १२ ।। मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका, पुंजिकस्थला, विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुद्बुदा तथा लता आदि नृत्य और गीतमें कुशल सहस्रों अप्सराओं और गन्धर्वोंके गण कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं ।। १०—१२ ।। अनिशं दिव्यवादित्रैर्नृत्यगीतैश्च सा सभा । अशून्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणैः ।। १३ ।। गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदायसे भरी तथा दिव्य वाद्य, नृत्य एवं गीतोंसे निरन्तर गूँजती हुई कुबेरकी वह सभा बड़ी मनोहर जान पड़ती है ।। १३ ।। किन्नरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथा परे ।। १४ ।। मणिभद्रोऽथ धनदः श्वेतभद्रश्च गुह्यकः । कशेरको गण्डकण्डूः प्रद्योतश्च महाबलः ।। १५ ।। कुस्तुम्बुरुः पिशाचश्च गजकर्णो विशालकः । वराहकर्णस्ताम्रोष्ठः फलकक्षः फलोदकः ।। १६ ।।