महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1672, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंहंसचूडः शिखावर्तो हेमनेत्रो विभीषणः । पुष्पाननः पिङ्गलकः शोणितोदः प्रवालकः ॥ १७ ॥ वृक्षवास्यनिकेतश्च चीरवासाश्च भारत । एते चान्ये च बहवो यक्षाः शतसहस्रशः ॥ १८ ॥ किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्यक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताम्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं ॥ १४—१८ ॥
सदा भगवती लक्ष्मीस्तत्रैव नलकूबरः । अहं च बहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्दिधाः ॥ १९ ॥ धन-सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी भगवती लक्ष्मी, नलकूबर, मैं तथा मेरे-जैसे और भी बहुत-से लोग प्रायः उस सभामें उपस्थित होते हैं ॥ १९ ॥
ब्रह्मर्षयो भवन्त्यत्र तथा देवर्षयोऽपरे । क्रव्यादाश्च तथैवान्ये गन्धर्वाश्च महाबलाः ॥ २० ॥ उपासते महात्मानं तस्यां धनदमीश्वरम् । ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा अन्य ऋषिगण उस सभामें विराजमान होते हैं। इनके सिवा बहुत-से पिशाच और महाबली गन्धर्व वहाँ लोकपाल महात्मा धनदकी उपासना करते हैं ॥ २० १/२ ॥
भगवान् भूतसङ्घैश्च वृतः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥ उमापतिः पशुपतिः शूलभृद् भगनेत्रहा । त्र्यम्बको राजशार्दूल देवी च विगतक्लमा ॥ २२ ॥ वामनैर्विकटैः कुब्जैः क्षतजाक्षैर्महारवैः । मेदोमांसाशनैरुग्रैरुग्रधन्वा महाबलः ॥ २३ ॥ नानाप्रहरणैरुग्रैर्वातैरिव महाजवैः । वृतः सखायमन्वास्ते सदैव धनदं नृप ॥ २४ ॥ नृपश्रेष्ठ! लाखों भूतसमूहोंसे घिरे हुए उग्र धनुर्धर महाबली पशुपति (जीवोंके स्वामी), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं ॥ २१—२४ ॥
प्रहृष्टाः शतशश्चान्ये बहुशः सपरिच्छदाः ।