महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1679, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेधा धृतिः श्रुतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः क्षमा ।। ३४ ।। सावित्री, दुर्गम दुःखसे उबारनेवाली दुर्गा, सात प्रकारकी प्रणवरूपा वाणी³, मेधा, धृति, श्रुति, प्रज्ञा, बुद्धि, यश और क्षमा, ।। ३४ ।। सामानि स्तुतिगीतानि गाथाश्च विविधास्तथा । भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशाम्पते ।। ३५ ।। नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिककारिकाः । तत्र तिष्ठन्ति ते पुण्या ये चान्ये गुरुपूजकाः ।। ३६ ।। साम, स्तुति, गीत, विविध गाथा तथा तर्कयुक्त भाष्य—ये सभी देहधारी होकर एवं अनेक प्रकारके नाटक, काव्य, कथा, आख्यायिका तथा कारिका आदि उस सभामें मूर्तिमान् होकर रहते हैं। इसी प्रकार गुरुजनोंकी पूजा करनेवाले जो दूसरे पुण्यात्मा पुरुष हैं, वे सभी उस सभामें स्थित होते हैं ।। ३५-३६ ।। क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवारात्रिस्तथैव च । अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च भारत ।। ३७ ।। युधिष्ठिर! क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, छहों ऋतुएँ, ।। ३७ ।। संवत्सराः पञ्च युगमहोरात्रश्चतुर्विधः । कालचक्रं च तद् दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम् ।। ३८ ।। धर्मचक्रं तथा चापि नित्यमास्ते युधिष्ठिर । साठ संवत्सर, पाँच संवत्सरोंका युग, चार प्रकारके दिन-रात (मानव, पितर, देवता और ब्रह्माजीके दिन-रात), नित्य, दिव्य, अक्षय एवं अव्यय कालचक्र तथा धर्मचक्र भी देह धारण करके सदा ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित रहते हैं ।। ३८ १/२ ।। अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सुरसा विनता इरा ।। ३९ ।। कालिका सुरभी देवी सरमा चाथ गौतमी ।। ४० ।। प्रभा कद्रूश्च वै देव्यौ देवतानां च मातरः । रुद्राणी श्रीश्च लक्ष्मीश्च भद्रा षष्ठी तथापरा ।। ४१ ।। पृथ्वी गां गता देवी ह्रीः स्वाहा कीर्तिरेव च । सुरा देवी शची चैव तथा पुष्टिररुन्धती ।। ४२ ।। संवृत्तिराशा नियतिः सृष्टिर्देवी रतिस्तथा । एताश्चान्याश्च वै देव्य उपतस्थुः प्रजापतिम् ।। ४३ ।। अदिति, दिति, दनु, सुरसा, विनता, इरा, कालिका, सुरभी देवी, सरमा, गौतमी, प्रभा और कद्रू—ये दो देवियाँ, देवमाताएँ, रुद्राणी, श्री, लक्ष्मी, भद्रा तथा अपरा, षष्ठी, पृथ्वी, भूतलपर उतरी हुई गंगादेवी, लज्जा, स्वाहा, कीर्ति, सुरादेवी, शची, पुष्टि, अरुन्धती संवृत्ति,