भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1680, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1680

आशा, नियति, सृष्टिदेवी, रति तथा अन्य देवियाँ भी उस सभामें प्रजापति ब्रह्माजीकी उपासना करती हैं॥ ३९—४३॥ आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनावपि । विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः ॥ ४४॥ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्य तथा मनके समान वेगशाली पितर भी उस सभामें उपस्थित होते हैं॥ ४४॥ पितॄणां च गणान् विद्धि सप्तैव पुरुषर्षभ । मूर्तिमन्तो हि चत्वारस्त्रयश्चाप्यशरीरिणः ॥ ४५॥ नरश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि पितरोंके सात ही गण होते हैं, जिनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन अमूर्त ॥ ४५॥ वैराजाश्च महाभागा अग्निष्वात्ताश्च भारत । गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः ॥ ४६॥ सोमपा एकशृङ्गाश्च चतुर्वेदाः कलास्तथा । एते चतुर्षु वर्णेषु पूज्यन्ते पितरो नृप ॥ ४७॥ एतैराप्यायितैः पूर्वं सोमश्चाप्याय्यते पुनः । त एते पितरः सर्वे प्रजापतिमुपस्थिताः ॥ ४८॥ उपासते च संहृष्टा ब्रह्माणममितौजसम् । भारत! सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात स्वर्गलोकमें विचरनेवाले महाभाग वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य (ये चार मूर्त हैं), एकशृंग, चतुर्वेद तथा कला (ये तीन अमूर्त हैं)। ये सातों पितर क्रमशः चारों वर्णोंमें पूजित होते हैं। राजन्! पहले इन पितरोंके तृप्त होनेसे फिर सोम देवता भी तृप्त हो जाते हैं। ये सभी पितर उक्त सभामें उपस्थित हो प्रसन्नतापूर्वक अमित तेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं ॥ ४६—४८ १/२ ॥ राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा ॥ ४९॥ नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते । स्थावरा जङ्गमाश्चैव महाभूतास्तथापरे ॥ ५०॥ पुरंदरश्च देवेन्द्रो वरुणो धनदो यमः । महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वशः ॥ ५१॥ इसी प्रकार राक्षस, पिशाच, दानव, गुह्यक, नाग, सुपर्ण तथा श्रेष्ठ पशु भी वहाँ पितामह ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं। स्थावर और जंगम महाभूत, देवराज इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम तथा पार्वतीसहित महादेवजी—ये सब सदा उस सभामें पधारते हैं ॥ ४९-५१॥ महासेनश्च राजेन्द्र सदोपास्ते पितामहम् । देवो नारायणस्तस्यां तथा देवर्षयश्च ये ॥ ५२॥ ऋषयो बालखिल्याश्च योनिजायोनिजास्तथा ।

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