महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1690, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥ ६ ॥ अद्भुत बल और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे ॥ ६ ॥
अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः । अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे ॥ ७ ॥
सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ॥ ८ ॥ क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें 'धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!' इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ॥ ८ ॥
एवंगते ततस्तस्मिन् पितरीवाश्वसज्जनाः । न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥ ९ ॥ उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी। उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा। इसीलिये वे 'अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ९ ॥
परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥ धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् । वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः । अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥ निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ॥ १०-११ ½ ॥
वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥ विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणा । अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥ सर्वमेव न तत्रासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।