भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1691

उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार—इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी। निर्धन प्रजाजनोंसे पिछले वर्षका बाकी कर नहीं लिया जाता था तथा चालू वर्षका कर वसूल करनेके लिये किसीको पीड़ा नहीं दी जाती थी। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले युधिष्ठिरके शासनकालमें रोग तथा अग्निका प्रकोप आदि कोई भी उपद्रव नहीं था ।। १२-१३ ½ ।।

दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ।। १४ ।। राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषा कृतम् ।

लुटेरोंसे, ठगोंसे, राजासे तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे प्रजाके प्रति अत्याचार या मिथ्या व्यवहार कभी नहीं सुना जाता था और आपसमें भी सारी प्रजा एक-दूसरेसे मिथ्या व्यवहार नहीं करती थी ।। १४ ½ ।।

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् ।। १५ ।। अभिहर्तुं नृपाः षट्सु पृथग् जात्यैश्च नैगमैः । ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।। १६ ।। कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभजैर्जनैः ।

दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योंमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा ।। १५-१६ ½ ।।

सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट् ।। १७ ।।

राजा युधिष्ठिरकी ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। सभी सद्गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत एवं उष्ण आदि सभी द्वन्द्वोंको सहनेमें समर्थ तथा अपने राजोचित गुणोंसे सर्वत्र सुशोभित होते थे ।। १७ ।।

यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः । यत्र राजन् दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा । अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः ।। १८ ।।

राजन्! दसों दिशाओंमें प्रकाशित होनेवाले वे महायशस्वी सम्राट् जिस देशपर अधिकार जमाते, वहाँ ग्वालोंसे लेकर ब्राह्मणोंतक सारी प्रजा उनके प्रति पिता-माताके समान भाव रखकर प्रेम करने लगती थी ।। १८ ।।

वैशम्पायन उवाच

स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातॄंश्च वदतां वरः । राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ।। १९ ।।