भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1701

वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः । पौण्ड्रको वासुदेवेति योऽसौ लोकेऽभिविश्रुतः ॥ २० ॥ जिसे मैंने पहले मारा नहीं, उपेक्षावश छोड़ रखा है, जिसकी बुद्धि बड़ी खोटी है, जो चेदिदेशमें पुरुषोत्तम समझा जाता है, इस जगत्‌में जो अपने-आपको पुरुषोतम ही कहकर बताया करता है और मोहवश सदा मेरे शंख-चक्र आदि चिह्नोंको धारण करता है; वंग, पुण्ड्र तथा किरातदेशका जो राजा है तथा लोकमें वासुदेवके नामसे जिसकी प्रसिद्धि हो रही है, वह बलवान् राजा पौण्ड्रक भी जरासंधसे ही मिला हुआ है ॥ १८—२० ॥

चतुर्थभाग् महाराज भोज इन्द्रसखो बली । विद्याबलाद् यो व्यजयत् सपाण्ड्यक्रथकैशिकान् ॥ २१ ॥ भ्राता यस्याकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत् । स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा ॥ २२ ॥ राजन्! जो पृथ्वीके एक चौथाई भागके स्वामी हैं, इन्द्रके सखा हैं, बलवान् हैं, जिन्होंने अस्त्र-विद्याके बलसे पाण्ड्य, क्रथ और कैशिक देशोंपर विजय पायी है, जिनका भाई आकृति जमदग्निनन्दन परशुरामके समान शौर्यसम्पन्न है, वे भोजवंशी शत्रुहन्ता राजा भीष्मक (मेरे श्वशुर होते हुए) भी मगधराज जरासंधके भक्त हैं ॥ २१-२२ ॥

प्रियाण्याचरतः प्रह्वान् सदा सम्बन्धिनस्ततः । भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः ॥ २३ ॥ हम सदा उनका प्रिय करते रहते हैं, उनके प्रति नम्रता दिखाते हैं और उनके सगे-सम्बन्धी हैं; तो भी वे हम-जैसे अपने भक्तोंको तो नहीं अपनाते हैं और हमारे शत्रुओंसे मिलते-जुलते हैं ॥ २३ ॥

न कुलं स बलं राजन्नभ्यजानात् तथाऽऽत्मनः । पश्यमानो यशो दीप्तं जरासंधमुपस्थितः ॥ २४ ॥ राजन्! वे अपने बल और कुलकी ओर भी ध्यान नहीं देते, केवल जरासंधके उज्ज्वल यशकी ओर देखकर उसके आश्रित बन गये हैं ॥ २४ ॥

उदीच्याश्च तथा भोजाः कुलान्यष्टादश प्रभो । जरासंधभयादेव प्रतीचीं दिशमास्थिताः ॥ २५ ॥ प्रभो! इसी प्रकार उत्तर दिशामें निवास करनेवाले भोजवंशियोंके अठारह कुल जरासंधके ही भयसे भागकर पश्चिम दिशामें रहने लगे हैं ॥ २५ ॥

शूरसेना भद्रकारा बोधाः शाल्वाः पटच्चराः । सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह ॥ २६ ॥ शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह । दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोशलाः ॥ २७ ॥ तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः ।