भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1702

मत्स्याः संन्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ २८ ॥ शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व, पटच्चर, सुस्थल, सुकुट्ट, कुलिन्द, कुन्ति तथा शाल्वायन आदि राजा भी अपने भाइयों तथा सेवकोंके साथ दक्षिण दिशामें भाग गये हैं। जो लोग दक्षिण पंचाल एवं पूर्वी कुन्तिप्रदेशमें रहते थे, वे सभी क्षत्रिय तथा कोशल, मत्स्य, संन्यस्तपाद आदि राजपूत भी जरासंधके भयसे पीड़ित हो उत्तर दिशाको छोड़कर दक्षिण दिशाका ही आश्रय ले चुके हैं ॥ २६—२८ ॥

तथैव सर्वपञ्चाला जरासंधभयार्दिताः । स्वराज्यं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतो दिशम् ॥ २९ ॥ उसी प्रकार समस्त पंचालदेशीय क्षत्रिय जरासंधके भयसे दुःखी हो अपना राज्य छोड़कर चारों दिशाओंमें भाग गये हैं ॥ २९ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य कंसो निर्मथ्य यादवान् । बार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद् वृथामतिः ॥ ३० ॥ कुछ समय पहलेकी बात है, व्यर्थ बुद्धिवाले कंसने समस्त यादवोंको कुचलकर जरासंधकी दो पुत्रियोंके साथ विवाह किया ॥ ३० ॥

अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽबले । बलेन तेन स्वज्ञातीनभिभूय वृथामतिः ॥ ३१ ॥ श्रैष्ठ्यं प्राप्तः स तस्यासीदतीवापनयो महान् । उनके नाम थे अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों अबलाएँ सहदेवकी छोटी बहिनें थीं। निःसार बुद्धिवाला कंस जरासंधके ही बलसे अपने जाति-भाइयोंको अपमानित करके सबका प्रधान बन बैठा था। यह उसका बहुत बड़ा अत्याचार था ॥ ३१ १/२ ॥

भोजराजन्यवृद्धैश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना ॥ ३२ ॥ ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता । उस दुरात्मासे पीड़ित हो भोजराजवंशके बड़े-बूढ़े लोगोंने जाति-भाइयोंकी रक्षाके लिये हमसे प्रार्थना की ॥ ३२ १/२ ॥

दत्त्वाक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा ॥ ३३ ॥ संकर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम् । हतौ कंससुनामानौ मया रामेण चाप्युत ॥ ३४ ॥ तब मैंने आहुककी पुत्री सुतनुका विवाह अक्रूरसे करा दिया और बलरामजीको साथी बनाकर जाति-भाइयोंका कार्य सिद्ध किया। मैंने और बलरामजीने कंस और सुनामाको मार डाला ॥ ३३-३४ ॥

भये तु समतिक्रान्ते जरासंधे समुद्यते । मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन् कुलैरष्टादशावरैः ॥ ३५ ॥