भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1704

'मैं हंसके बिना इस संसारमें जीवित नहीं रह सकता।' ऐसा निश्चय करके डिम्भकने अपनी जान दे दी ॥ ४२ ॥ तथा तु डिम्भकं श्रुत्वा हंसः परपुरंजयः । प्रपेदे यमुनामेव सोऽपि तस्यां न्यमज्जत ॥ ४३ ॥ डिम्भककी इस प्रकार मृत्यु हुई सुनकर शत्रु-नगरीको जीतनेवाला हंस भी भाईके शोकसे यमुनामें ही कूद पड़ा और उसीमें डूबकर मर गया ॥ ४३ ॥ तौ स राजा जरासंधः श्रुत्वा च निधनं गतौ । पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ! उन दोनोंकी मृत्यु हुई सुनकर राजा जरासंध हताश हो गया और उत्साहशून्य हृदयसे अपनी राजधानीको लौट गया ॥ ४४ ॥ ततो वयममित्रघ्न तस्मिन् प्रतिगते नृपे । पुनरानन्दिनः सर्वे मथुरायां वसामहे ॥ ४५ ॥ शत्रुसूदन! उसके इस प्रकार लौट जानेपर हम सब लोग पुनः मथुरामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४५ ॥ यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना । कंसभार्या जरासंधं दुहिता मागधं नृपम् । चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता ॥ ४६ ॥ पतिघ्नं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिंदम । शत्रुदमन राजेन्द्र! फिर जब पतिके शोकसे पीड़ित हुई कंसकी कमललोचना भार्या अपने पिता मगधनरेश जरासंधके पास जाकर उसे बार-बार उकसाने लगी कि मेरे पतिके घातकको मार डालो ॥ ४६ १/२ ॥ ततो वयं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् ॥ ४७ ॥ संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप । तब हमलोग भी पहले की हुई गुप्त मन्त्रणाको स्मरण करके उदास हो गये। महाराज! फिर तो हम मथुरासे भाग खड़े हुए ॥ ४७ १/२ ॥ पृथक्त्वेन महाराज संक्षिप्य महतीं श्रियम् ॥ ४८ ॥ पलायामो भयात् तस्य ससुतज्ञातिबान्धवाः । इति संचिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः ॥ ४९ ॥ राजन्! उस समय हमने यही निश्चय किया कि 'यहाँकी विशाल सम्पत्तिको पृथक्-पृथक् बाँटकर थोड़ी-थोड़ी करके पुत्र एवं भाई-बन्धुओंके साथ शत्रुके भयसे भाग चलें।' ऐसा विचार करके हम सबने पश्चिम दिशाकी शरण ली ॥ ४८-४९ ॥ कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् । ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप ॥ ५० ॥