महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1705, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर राजन्! रैवतक पर्वतसे सुशोभित रमणीय कुशस्थली पुरीमें जाकर हमलोग निवास करने लगे ॥ ५० ॥ तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम् । स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः ॥ ५१ ॥ हमने कुशस्थली दुर्गकी ऐसी मरम्मत करायी कि देवताओंके लिये भी उसमें प्रवेश करना कठिन हो गया। अब तो उस दुर्गमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं, फिर वृष्णिकुलके महारथियोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ५१ ॥ तस्यां वयममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभयाः । आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च ॥ ५२ ॥ माधवाः कुरुशार्दूल परां मुदमवाप्नुवन् । शत्रुसूदन! हमलोग द्वारकापुरीमें सब ओरसे निर्भय होकर रहते हैं। कुरुश्रेष्ठ! गिरिराज रैवतककी दुर्गमताका विचार करके अपनेको जरासंधके संकटसे पार हुआ मानकर हम सभी मधुवंशियोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई है ॥ ५२ १/२ ॥ एवं वयं जरासंधादभितः कृतकिल्बिषाः ॥ ५३ ॥ सामर्थ्यवन्तः सम्बन्धाद् गोमन्तं समुपाश्रिताः । राजन्! हम जरासंधके अपराधी हैं, अतः शक्तिशाली होते हुए भी जिस स्थानसे हमारा सम्बन्ध था, उसे छोड़कर गोमान् (रैवतक) पर्वतके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ५३ १/२ ॥ त्रियोजनायतं सद्य त्रिस्कन्धं योजनावधि ॥ ५४ ॥ योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम् । अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः ॥ ५५ ॥ रैवतककी दुर्गकी लम्बाई तीन योजनकी है। एक-एक योजनपर सेनाओंके तीन-तीन दलोंकी छावनी है। प्रत्येक योजनके अन्तमें सौ-सौ द्वार हैं, जो सेनाओंसे सुरक्षित हैं। वीरोंका पराक्रम ही उस गढ़का प्रधान फाटक है। युद्धमें उन्मत्त होकर पराक्रम दिखानेवाले अठारह यादववंशी क्षत्रियोंसे वह दुर्ग सुरक्षित है ॥ ५४-५५ ॥ अष्टादश सहस्राणि भ्रातॄणां सन्ति नः कुले । आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः ॥ ५६ ॥ हमारे कुलमें अठारह हजार भाई हैं। आहुकके सौ पुत्र हैं, जिनमेंसे एक-एक देवताओंके समान पराक्रमी हैं ॥ ५६ ॥ चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः । अहं च रौहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च ॥ ५७ ॥ एवमतिरथाः सप्त राजन्नन्यान् निबोध मे । कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समितिंजयः ॥ ५८ ॥ कङ्कः शङ्कुश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः ।