महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1707, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिव्रजे । कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः ॥ ६३ ॥ उसने सब राजाओंको जीतकर गिरिव्रजमें इस प्रकार कैद कर रखा है, मानो सिंहने किसी महान् पर्वतकी गुफामें बड़े-बड़े गजराजोंको रोक रखा हो ॥ ६३ ॥
स हि राजा जरासंधो यियक्षुर्वसुधाधिपैः । महादेवं महात्मानमुमापतिमरिंदम ॥ ६४ ॥ आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवाः । प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम ॥ ६५ ॥ शत्रुदमन! राजा जरासंधने उमावल्लभ महात्मा महादेवजीकी उग्र तपस्याके द्वारा आराधना करके एक विशेष प्रकारकी शक्ति प्राप्त कर ली है; इसीलिये वे सभी राजा उससे परास्त हो गये हैं। वह राजाओंकी बलि देकर एक यज्ञ करना चाहता है। नृपश्रेष्ठ! वह अपनी प्रतिज्ञा प्रायः पूरी कर चुका है ॥ ६४-६५ ॥
स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान् पृतनागतान् । पुरमानीय बद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम् ॥ ६६ ॥ क्योंकि उसने सेनाके साथ आये हुए राजाओंको एक-एक करके जीता है और अपनी राजधानीमें लाकर उन्हें कैद करके राजाओंका बहुत बड़ा समुदाय एकत्र कर लिया है ॥ ६६ ॥
वयं चैव महाराज जरासंधभयात् तदा । मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६७ ॥ महाराज! उस समय हम भी जरासंधके भयसे ही पीड़ित हो मथुराको छोड़कर द्वारकापुरीमें चले गये (और अबतक वहीं निवास करते हैं) ॥ ६७ ॥
यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि । यतस्व तेषां मोक्षाय जरासंधवधाय च ॥ ६८ ॥ राजन्! यदि आप इस यज्ञको पूर्णरूपसे सम्पन्न करना चाहते हैं तो उन कैदी राजाओंको छुड़ाने और जरासंधको मारनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६८ ॥
समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन । राजसूयश्च कार्त्स्न्येन कर्तुं मतिमतां वर ॥ ६९ ॥ बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना राजसूययज्ञका आयोजन पूर्णरूपसे सफल न हो सकेगा ॥ ६९ ॥
(जरासंधवधोपायश्चिन्त्यतां भरतर्षभ । तस्मिन् जिते जितं सर्वं सकलं पार्थिवं बलम् ॥) भरतश्रेष्ठ! आप जरासंधके वधका उपाय सोचिये। उसके जीत लिये जानेपर समस्त भूपालोंकी सेनाओंपर विजय प्राप्त हो जायगी।